Friday, December 19, 2025

तुमने क्या किया?

 जानते हो 

तुम्हारे दिए उन ढाई उपहारों का 

मैंने क्या किया?  


प्रथम एक पारदर्शी शीशी में घुला इत्र था - 

हेमंत की बर्फ सा पवित्र था,  

वर्षा की मिट्टी सी सुगंध थी

मानो मेरी संजीवनी उसमें बंद थी, 

जानती थी - 

मात्र नाड़ी बिंदुओं पर छिड़कना था 

पर मैंने तो अंतस तक उड़ेल दिया।   


द्वितीय एक अर्धव्यक्त तार था 

शिशिर की धूप सा आकार था।  

कहीं अंजन की ग्रीष्म निशा से उपमा  

तो कहीं मेरी मुस्कान पर सूरजमुखी का अलंकार था,   

जानती थी - 

मात्र सराह कर बिसरना था   

पर मैंने तो पंक्ति पंक्ति चिरस्मृति में बसा ली

आगे की कविता स्वयं ही रच डाली।  


तृतीय वही प्रस्तावी गुलाब था 

एक पुष्प में सिमटा मेरा बसंतकाल था 

अरुणिम छाया काया पर पसर गयी थी 

और मैं शरद सी बिखर गयी थी।  

जानती थी - 

बस किसी किताब में छुपाना था   

पर मैंने पंखुड़ियों को पीस कर 

कुमकुम बना लिया 

कुछ मस्तक पर तो कुछ मांग में सजा लिया।  


कभी तुम भी बताओ 

तुमने क्या किया - 

अवैध समझ के नकार दिया

असत्य समझ कर फाड़ दिया 

या कलंक समझ कर झाड़ दिया?   

मेरे ढाई अक्षर के उपहार का  

तुमने क्या किया? 


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पृष्ठभूमि:

पेड़ शर्ते नहीं माने तो कट गए, गमलों ने हदें तय की तो आसरा मिला।  

 मैं उस प्रेम के गीत लिखूंगी जो गमले में नहीं धरती पर उगता है - अमृता प्रीतम 

उपहारो के त्यौहार पर प्रस्तुत श्रृंगार और रौद्र रस का समन्वय मेरी रचना "तुमने क्या किया?"   

Copyrighted/Published: https://sahityakunj.net/entries/view/tumane-kyaa-kiyaa 

Background Photo Credits: https://www.istockphoto.com/photo/three-christmas-presents-gm157649571-13835603 


Wednesday, October 15, 2025

कहाँ गईं वह दो चोटियाँ ?

 कहाँ  गईं वह दो चोटियाँ ? 


इस विश्वामित्र से जीवन में 

मेनका सा आया "हाई-स्कूल रीयूनियन"  का दिन 

इन्द्रियों को भटका गए भिन्न भिन्न विषयों के प्रश्न चिन्ह।   


पहले तो कानों में गूंजे 

णित के दो सवाल - 

अरे! कहाँ गयी वह दो चोटियाँ ?

और कहाँ गयी वह बत्तीसी मुस्कान? 


फिर धुंधले से दिखे भौतिकी के सवाल - 

क्या दूरंदेश के उत्तल से 

पास दिखता है अतीत का आसमान?

लगभग किस गति पर उड़ा था 

वह ढाई दशक का विमान?   


फिर  चखने में आए रसायन विज्ञान के सवाल - 

किस प्रसाधन से धोई थी 

वह सरलता की निखार?  

किस मिलावट में खोई थी 

वह उत्साह की फुहार? 

 

फिर श्वास में आये भाषा के सवाल - 

क्या अब भी कर सकती हो 

फ़िल्मी गीतों का संस्कृत में अनुवाद? 

क्या वंश कर पाते है मातृभाषा में संवाद?  


अंत में स्पर्श किये पाठ्यक्रम के बाहर के सवाल - 

कहाँ गयी सिर चढाने वाली 

वह दो गुदगुदाती सहेलियां?

और कहाँ गए 

हर बात पर चिढ़ाने वाले 

वह दो नटखट यार? 


इन्द्रियों को बहलाने वाला   

उत्तर था तैयार - 

यह सारे प्रश्न 

हैं निरर्थक अनाकार 

क्योंकि हूँ केंद्रित मैं 

गृहस्थ सजाने में 

पत्नी की माँ की भूमिका निभाने में,  

बड़े लक्ष्यों को चूरने में

जीवन के अधिक महत्वपूर्व 

प्रश्नों को पूरने में।  


हालांकि इस फुसलाने से तो 

एक इन्द्रिय ना झुकी थी, 

पर इस ही बीच, अवचेतन की 

एक किशोरी उठ खड़ी थी -  

जो संयोग से खोज रही थी 

बिलकुल इन्ही मार्मिक प्रश्नो के उत्तर, 

इसीलिए रजत जयंती पर

आयी सचेतन 

लेकर रजत चढ़े सर

संग दबे-दबे अधर, 

यही जानने कि -    

कहाँ गयी वह लाल रिबन में झूलती 

दो लम्बी लम्बी चोटियाँ?

और कहाँ गयी वह बेपरवाह बेक़सूर 

बिन बात की मुस्कान? 


Copyrighted/Published: https://sahityakunj.net/entries/view/kahaan-gaiin-vah-do-chotiyaan#google_vignette 

Monday, August 18, 2025

मेरे संग?

https://sahityakunj.net/entries/view/mere-sang  

मेरे संग?

 
दिन रात
एक उपदेश सुनाई आता है - 
सूरज चाँद के जैसे  
हर में से हर एक 
अकेले ही आता 
और अकेले ही जाता है।  

पर उपदेश के भेष में 
मुझे यह उपहास नज़र आता है, 
क्योकि -  
मैं तो अकेली नहीं आई थी, 
संग एक बहुमुखी सुरंग लाई थी।  
हाँ! एक सुरंग 
जो कभी मशाल की बदली बन ध्यान बरसाती,  
तो कभी ढाल की छतरी बन शरण दे जाती, 
कभी उड़नखटोला बन गगन सैर करवाती,
तो कभी तारक सेतु बन मुझ एक को अनेकों से जोड़ जाती।   
 
मैं तो सरल मोम थी 
पर असलियत विलोम थी - 
मशाल थी धुआँ 
और ढाल थी कुआँ,  
उड़नखटोला नहीं था बेड़ियों का खाट
और सेतु नहीं -
था भीड़ से भेड़ बनने की यात्रा के अंत में खड़ा 
एकांतवास का द्वार।

तार तार हुआ था 
मेरा हर यथार्थ , 
और उपहास की पात्र 
तो मैं थी मात्र ! 
सुरंग थी ही नहीं  
थी तो बस मैं
अकेली खोखली स्वयं से हारी ,
सच कहती थी कलकत्ते की संतनी 
कोई संग न होना है दुनिया की सबसे बड़ी बीमारी।  

पर एक शांत कहावत भी है  
नकारना है बीमारी  
तो उपचार है भान, 
तो वर्षों के मंथन से 
अंततः लिया यह जान - 

है संग एक प्रभात
जो मेरी काया को जांच 
कर्मों को छाँट लेती है, 
है संग एक रात
जो मेरी रूह को जान 
कम्पन को पहचान लेती है।  
है संग एक ब्रह्माण्ड 
जो मेरी जीवन दृष्टि 
ज्यों का त्यों नाँद रहा है,  
और है संग एक चुम्बकीय भूगोल 
जो मुझे अरुणिमा पूर्णिमा 
और ब्रह्माण्ड की त्रिवेणी से बाँध रहा है।  

हाँ मैं अकेली नहीं 
एकांत में हूँ, 
अँधेरी नहीं 
अयथार्थता को चीरते  
चिराग में हूँ।     
बीमारी में नहीं 
आत्मा को वास्तविक रूप से खिलाते 
वसंतकाल में हूँ।
खोखली नहीं 
समाज से अप्रभावित 
परिवेश सुकान्त में हूँ।
सुरंग में नहीं 
स्वयं को टटोलते 
आत्म साक्षात्कार के उपहार में हूँ। 
हाँ! मैं अकेली नहीं 
अकेलेपन के अंत  
एक सुन्दर अनुभूति 
एकांत  में हूँ।  

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भूमिका : 

गर वह बूँद भी मिल गयी होती सागर में 
तो कहाँ से वह मोती होता 
तन्हाई की भी अपनी वजह होती है - गुलज़ार 

विश्वशनीय सूत्रों से 
पता चला है कि 
मायावन की पत्ती पत्ती झूठी है, 
एकजुट सी दिखती 
इस बेल की 
हर कड़ी ही टूटी है।  

फिर भी विवेकमय  - 
खींच ही लेती हूँ 
हर क्षण में सांस 
तपोवन की धरती जो 
अब तक ना रूठी है, 
और छोड़ ही देती हूँ 
हर छंद को पार 
सरस्वती कृपा जो
अब तक न छूटी है।  



एकांतवास से हाल ही में लौटी 
मेरी नयी रचना - मेरे संग?

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Extra 

it takes 4-6 weeks of uncomfortabl isolation to rediscover who you are. Vision is formed alone. You cnt listen to friends. You cant listen to family. You cant listen to critics. What you are meant to do is seen through your eyes only. Other eyes will filter them. To their dreams. To their desires. To their view of whats possible. Dont seek attention when you dont know yourself. That confusion is a gift. When you embrace it, everything changes. YOur reality must break a few times before your path becomes clear. 

तुम्हारा एकांत ही तुम्हे मनुष्य बना सकता है , भीड़ तुम्हे भेड़ बना देगी।  
attention , protection , freedom , connection  

समाज से अप्रभावित 
प्रदूषण मुक्त