सबसे पहले तो आप सभी को हिंदीदिवस की शुभकामनाएँ! जो १४ सितम्बर को मनाया जाता है।
इस ही उपलक्ष्य में मैं आज हिंदी कविता सुनाने जा रही हूँ। फेसबुक इंस्टाग्राम टिकटॉक, AI की चकाचौंध छोड़ कर आज आप कवितायें सुनने आये हैं और वह भी हिंदी की उसके लिए आप सभी का धन्यवाद।
शुरू करती हूँ - कुछ रिश्ते हमें प्राणों से भी अधिक प्यारे होते हैं - पर हम उन्हें कोई एक नाम नहीं दे दे पाते। समझ नहीं पाते कि उन्हें क्या बुलाएं।
माँ सरस्वती की असीम कृपा से रची मेरी कविता का शीर्षक है - क्या लगती हो तुम मेरी?
क्या लगती हो तुम मेरी?
चार भेष में
आती एक
झिलमिल करती फेरी,
अदल बदल यूँ जाती
मानो झट से हो पहन
आती
अलग-अलग
शैली में एक साड़ी चंदेरी,
छाने-बीने तो खूब
तुम्हारे चन्द्रमय
बहुरूप,
फिर भी मैं हूँ अनजान अँधेरी,
नहीं जानती -
क्या लगती हो तुम मेरी!
अगले चार छंदों में चार रूपों का वर्णन किया है -
पहली बार देखा तो लगा
अनंत प्रार्थनाओं के बाद
सीधे परीनगर से आयी बिना
किसी मिलावट
के,
बार बार देखा तो लगा जैसे
मैंने ही बनाया इसे अपनी
लिखावट से,
नयन-नक्श से लगती मेरी आँखों की चन्द्रबिन्दु का तारा,
जब बन जाती मेरी
आत्मजा मेरे प्राणों का अंतिम सहारा । (१)
पहला रूप बेटी का था
कभी थक जाती तो बन जाती मेरी अवमूल्यित माँ,
बड़ी सरलता से सिखा देती
जीवन का कठिन व्याकरण,
एक शब्द प्रयोग ना करती
बस दिखा देती एक जीवित उदाहरण । (२)
दूसरा रूप माँ का है
जब बन जाती माँ भारती
सुधाती सारे मूल रूप संधियों को तोड़ मोड़ के,
परदेस में रखती मुझे जड़ों से जोड़ के,
रोक नहीं पाऊँ आनंदमय अश्रु -
जब सुन लूँ अपने अंशों को दो शब्द भी इसके बोलते। (३)
तीसरा रूप भारत माता का है
देती वेद मन्त्रों का उच्चारण वीणा वाणी की स्वरा,
अंतस तक रखती मुझको उच्च-कम्पित सुशोभित खरा,
जब जिव्हा पर उतर जाती चढ़ जाती बन कर माँ अक्षरा । (४)
चौथा रूप सरस्वती माँ का है ,अंतिम कुछ पक्तियों से कविता समाप्त करूंगी
छाने-बीने तो खूब तुम्हारे चन्द्रमय बहुरूप,
फिर भी मैं हूँ अनजान अँधेरी,
नहीं जानती
-
लगाऊँ कौन से स्वर,
सजाऊँ कौन
से व्यंजन,
कैसे करूँ नमन,दूँ कौन सा उपहार?
कैसे मनाऊँ यह चौदह सितम्बर का
मेरा मनभावन त्यौहार?
अब बस भी करो यह रिश्तों की हेरा फेरी, बताओ ना! क्या लगती हो तुम मेरी?
एक्स्ट्रा -
तरह तरह से रिझाते अधूरे-पूरे अक्षर के आकार,
श्रृंगार रस से भीगा लगता उपमा रूपक का संसार,
बन जाती मैं खुद का सबसे सुन्दर अनुवाद,
जब बन जाती तुम मेरी प्रीति मेरा अनुराग। (१)