Friday, January 2, 2026

kya lagti ho tum meri - short for recital

भारतवर्ष में मनाए जाने वाले पचासों पर्वों में से मेरे सबसे मनभावन पर्व पर सीधे ह्रदय से निकली मेरी रचना -

क्या लगती हो तुम मेरी?

पांच भेष में आती एक झिलमिल करती फेरी,
अदल बदल यूँ जाती 
मानो झट से हो पहन आती 
अलग-अलग शैली में एक साड़ी चंदेरी,  
छाने-बीने तो खूब
तुम्हारे चन्द्रमय बहुरूप
फिर भी मैं हूँ अनजान अँधेरी,
नहीं जानती - 
क्या लगती हो तुम मेरी! 

तरह तरह से रिझाते अधूरे-पूरे अक्षर के आकार,
श्रृंगार रस से भीगा लगता उपमा रूपक का संसार, 
बन जाती मैं खुद का सबसे सुन्दर अनुवाद, 
जब बन जाती तुम मेरी प्रीति मेरा अनुराग। (१) 

पहली बार देखा तो लगा 
अनंत प्रार्थनाओं के बाद 
सीधे परीनगर से आयी बिना किसी मिलावट के, 
बार बार देखा तो लगा जैसे मैंने ही बनाया इसे अपनी लिखावट से, 
नयन-नक्श से लगती मेरी आँखों की चन्द्रबिन्दु का तारा, 
जब बन जाती मेरी आत्मजा मेरे प्राणों का अंतिम सहारा  (२) 

कभी थक जाती तो बन जाती मेरी अवमूल्यित माँ, 
बड़ी सरलता से सिखा देती जीवन का कठिन व्याकरण,
एक शब्द प्रयोग ना करती बस दिखा देती एक सुदृढ़ उदाहरण  (३)  

जब बन जाती माँ भारती सुधाती सारे मूल रूप संधियों को तोड़ मोड़ के, 
परदेस में रखती मुझे जड़ों से जोड़ के, 
रोक नहीं पाऊँ आनंदमय अश्रु - जब सुन लूँ अपने अंशों को दो शब्द भी इसके बोलते (४) 

देती वेद मन्त्रों का उच्चारण वीणा वाणी की स्वरा, 
अंतस तक रखती मुझको उच्च-कम्पित सुशोभित खरा, 
जब जिव्हा पर उतर जाती बन कर माँ अक्षरा  (५) 

छाने-बीने तो खूब तुम्हारे चन्द्रमय बहुरूप
फिर भी मैं हूँ अनजान अँधेरी,
नहीं जानती -
लगाऊँ कौन से स्वर,
सजाऊँ 
कौन से व्यंजन
कैसे करूँ नमन,दूँ कौन सा उपहार?
कैसे मनाऊँ यह चौदह सितम्बर का मेरा मनभावन त्यौहार? 
अब बस भी करो यह रिश्तों की हेरा फेरीबताओ ना! क्या लगती हो तुम मेरी?

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हिंदी दिवस की अनेकों शुभकामनायें !