Thursday, June 22, 2023

सातवाँ मौसम

 सातवां मौसम 

मौसम के समाचार से
बेखबर बेसुध, 
एक कांच के बुलबुले में 
बैठी जैसे कोई बुत। 

पीले गेरुए के
मध्य का रंग
पत्तियों का एक युगल
मानो युग युग का संग,   
अनायास यूँ  
उड़ आया मेरे पास,
जैसे चर्म फेंक कर 
आ बैठी दबी हुयी एक आस। 
और मैं -
चावल सी खिली थी  
खीर की मिठास से, 
चाँदनी सी धुली थी  
शरद के पूर्णमास से।  

जोड़े को संग बाँध रहा
एक 
ऊनी गुलाबी गोल,
धुएं के संग संग
निर्गम करता
पिघलाने वाले बोल, 
और मैं -
बर्फ सी चमकी थी
रूप से स्वरूप से,
सोने सी दमकी थी 
हेमंत की धूप से। 

ऊन की डेरी 
बिखर बनी 
पतंगों की डोरियाँ, 
निःस्पर्श खींच रही
हरियाली की लोहड़ियाँ
और मैं - 
उस भावुक क्षण में जमी थी
शून्य से नीचे गिरते पारे से,  
अंतस तक थमी थी 
शिशिर के शीतल आरे से।  

ओरिगेमी से पतंग
मुड़ मुड़ कर बनी
रंगीन फूलों की लड़ी,  
नदियों का मिलन 
दे गया आत्मीयता की कड़ी,  
और मैं - 
सरसों सी लहरायी थी 
कोकिल की फनकार से, 
सोलह सी इठलायी थी  
बसंत के श्रृंगार से।  

फूल फूल पर
राहत से बैठे   
छुट्टी वाले खेल,
खुली छत मन छेड़े 
वह ठंडी रात बेमेल।   
और मैं - 
सुबह सी सधी थी 
फलरसों के प्रकाश से, 
पुनः जीवन से भरी थी 
ग्रीष्म के अवकाश से।     

खेलों ने लड़ भिड़ कर
तोड़ी बांधों की तान,
पानी पानी करती 
एक इंद्रधनुषी मुस्कान।  
और मैं - 
नज़रों से बची थी
बादल के अंजन से,
मिट्टी के इत्रों से सजी थी  
वर्षा के अभिव्यंजन से।

वह छह ऋतुएँ थी 
एक पल के समान 
एक अंकुशित साहिल
के जल के समान।  

और ... 

अब वही छह ऋतुएँ 
एक सदी के समान, 
समुद्र खोजती विषाद में सूखती 
एक नदी के समान।

और मैं -  
एक कागज़ की नाव 
अश्रुवर्षा में भीगी
ढूँढ रही एक छोर, 
यह दलदली यात्रा 
जितनी कठिन उतनी कठोर।  

और उस पर 
निरुत्तर अकाल का वार 
मानो हो एकतरफा प्यार,  
अनंत तपस्या, अनंत त्याग 
ग्रीष्म से गहरी विरह की आग।  

फिर बसंत की उलझन संग 
धूल में ओझिल होती 
वही सदी पुरानी आस,
ना कलकल ना कोयल 
बस सुनने में आती
रुकी रुकी सी साँस।  

शिशिर की डोरी सी
थी सिमटी सिमटी
रग रग से,
बिखरने की ललक थी 
पर कांधा ना मिला
जाने कब से।  
फिर कड़ाके की ठण्ड 
उस पर कोहरा अनंत
हेमंत न हुआ
हुआ जीवन का अंत।  

और यह शरद तो 
जैसे हो कोई अमावस 
सुई हिलाये जाऊँ 
पर धागा जस का तस।  
और मैं बस 
ढूँढ रही
वही बीच का रंग, 
एक अंतिम पत्ती 
जिस पर लिख डालूँ
एक अंतिम रक्तरंजित छंद। 

हे ऋतुराज!
अब बस
एक सातवें मौसम का इंतज़ार, 
जो ना मुझे रिझाए 
ना दे कोई उपहार, 
जिसे ना मैं रिझाऊँ 
ना करूँ अपलक निहार, 
बस हो एक संयम एक समभाव,  
फिर हों ऐसे दो जन्म 
कि सहजतः मन जाए
एक जीवंत त्यौहार।

पृष्ठभूमि: अठखेलियों से संजीदगी तक की अनगिनत ऋतुओं से होती हुई यात्रा - मेरी नयी रचना "सातवां मौसम"

कॉपीराइट: 
1."मेरे सूरज का टुकड़ा" में प्रकाशित https://www.amazon.in/dp/B0C4QHLB18/ 
2. https://sahityakunj.net/entries/view/saatavaan-mausam
फोटो क्रेडिट्स: http://www.sutrajournal.com/the-six-seasons-part-three-by-freedom-cole 

Thursday, June 8, 2023

प्लीज़! हैंडल विथ केयर

 छुई मुई सी लगती है 

बिन छेड़े पिनकती है,
भावनाओं की बदली बन 
बिन मौसम बरसती है।  
तेज़ रोशनी ऊँचे स्वर से 
तंग तंग सी फिरती है,
दूजों द्वारा संचालित
परतंत्र पतंग सी उड़ती है। 

संगत इसकी ऐसी है कि
घुटन भरी सी लगती है,
साँस जिव्हा चाल हमारी

संभल संभल कर चलती है। 
एक अनाम पत्र लिखने को 
यह अंगुलियाँ तरसती हैं -   
या तो चमड़ी मोटी करने की 
शल्यचिकित्सा करवा लो 
या "प्लीज़! हैंडल विथ केयर"
का मस्तक पर टैटू खुदवा लो! 

ढीली टिप्पणियों के मध्य 
कमल सा विराजमान,
मात्र ढाई दशक पुराना
एक कसा हुआ विज्ञान -
कुछ चयनित का तंत्रिका तंत्र
है मूलतः असमान, 
सौ में से मात्र पंद्रह हैं 
अति-संवेदनशील इंसान। 

किसी कक्ष में घुंसते ही 
जब दूजों को दिखती हैं
मेज़ कुर्सी
 ताखाएँ, 
इन चयनितों को दिखती हैं 
मित्रता शत्रुता सूक्ष्म मनोदशाएँ 
सज्जाकार के व्यक्तित्व की विशेषताएँ। 

हाँ! अतिउत्तेजना से
दूजों की अपेक्षा जल्दी थक जाते हैं,  

पर अतिअवशोषण से 
दूजों से चूका नकारा
सहजता से ग्रहण कर पाते हैं,
अकसर रूचि के क्षेत्र में 
प्रथम अन्वेषक बन जाते हैं,
समानुभूति से
प्रतिध्वनित नेतृत्व दिखलाते हैं
और अनायास ही
अपवादक नायक कहलाते हैं। 

यह संवेदना की प्रवृत्ति 
है वास्तव वंशगत 
और पूर्णतः स्थायी सामान्य। 
क्या निजी तौर पर 
जानते हो कुछ ऐसे भावपूर्व इंसान?
तो समझना स्वयं को थोड़ा भाग्यवान 
क्योंकि शोधकार्य से है सिद्ध -
इन अल्पसंख्यंकों के बलबूते ही 
कार्यस्थल फलते हैं 
मित्रमण्डल निर्विघ्न चलते हैं
परिवार में रचनात्मक समाधान निकलते हैं। 

और यदि कहीं तुम ही हो
उन 
पंद्रह में एक गैर,
तो आओ चलो करवाते हैं 
आत्म संदेह से आत्म स्वीकृति की सैर। 

भूतकाल के सुप्रसिद्ध 
अविष्कारक प्रवर्तक कलाकार,
तुम जैसे ही थे जिनमें थी 
रचनात्मकता अनुराग,
अंतर्दृष्टि के संग संग था
देखरेख का भाव,
मृत्युकालिक अपिरिचित से
कुछ चर्चा का चाव। 
 

पर विडंबना
कुछ ऐसी है आज, 
कि जहाँ देखो वहाँ 
योद्धाओं का राज,
इन परामर्शदाताओं को
रत्ती भर ना पूछे यह कुपोषित समाज। 

मगर तुम्हे तो
सारी जानकारी है,
यह जो सर्वव्यापी असुरक्षा 
थकावट भूख बीमारी है,    
तुम्हें तो सबकुछ दिखता है 
यह जो सामाजिक अचेतन से
अभ्यन्तर जीवन में रिक्तता है। 
तुम्हे तो स्वतः है
भविष्य का भान, 
जन्मजात सज्जित हैं
तुम में 
अशक्त जीवों के 
संकटों के समाधान। 

तो करनी होगी तुम्हें
मानव सभ्यता की पावन प्रस्तुति,
और दिखानी होगी 
योद्धाओं के मध्य
पुरोहित की गहन 
उपस्थिति
मनाना ही होगा 
इन प्रतिभाओं 
का महात्यौहार, 
मिला जो है यह 
संवेदनशीलता की
महाशक्ति का दुर्लभ उपहार।  

तो गर्व से कर लेना
स्वयं को स्वीकार,
कर्त्तव्य से कर लेना 
स्वयं का अलंकार,
कुछ भी हो 
ढूँढ ही लेना 
एक योग्य रोशनी उचित स्वर,
और स्वयं को कर ही लेना
"प्लीज़! हैंडल विथ केयर"।


सन्दर्भ: "The Highly Sensitive Person: How to Thrive When the World Overwhelms You" - Dr Elaine Aron 


पृष्ठभूमि:
दुनिया के लगभग १५% लोग "अति-संवेदनशील" (highly sensitive) होते हैं।
डॉ. इलेन ऐरन के शोधकार्य से सिद्ध हुआ है कि इन अल्पसंख्यकों का तंत्रिका तंत्र कुछ अलग प्रकार से रचा गया है।  
World Empathy Day पर प्रस्तुत है मेरी नयी रचना - "प्लीज़! हैंडल विथ केयर"

Copyright: https://sahityakunj.net/entries/view/please-handle-with-care  

Photo credit: https://www.simplypsychology.org/highly-sensitive-persons-traits.html
  

Wednesday, January 11, 2023

कहाँ तक पढ़े हो?

 कहाँ तक पढ़े हो?


साक्षात्कर्ता का
सरसराता पहला सवाल -
संक्षिप्त में बताइये
कौन हैं आप नौजवान?
नमस्कार! शुभ प्रभात
मुझसे मिलिए - 
मैं इस सदी का "सुशिक्षित" इंसान।   
दूजे प्रश्न संग पेंचीला निहार -
अब शिक्षा की परिभाषा का
यूँ कीजिए विस्तार,
कि स्पष्ट छन जाए
कि कौन पढ़ा-लिखा सुशिक्षित
और कौन अनपढ़ गँवार। 

इस पर्वतीय प्रश्नद्वय से 
मैं निरुत्तर बेचैन,  
पर दो पर्वतों के मध्य से
जैसे सूर्य सी उगती
एक तस्वीर पर ठहरे नैन।
सदी पुराना दूत
आज भी सर्वभूत,
लघु-महा विद्यालयों में
कार्यालयों पुस्तकालयों में,
राजपत्रों सुविचारों में
सोशल मीडिया की दीवारों में।
विचार श्रृंखला टूटी
तो था शृंग सा ऊंचा उजाला
अवचेतन मन से
यह सजा सजाया उत्तर दे डाला - 

शिक्षा के अर्थ से पहले 
समझना होगा धर्म का भावार्थ,  
क्योंकि धर्म ही है 
शिक्षा का साधक आधार,  
और असली धर्म है 
अध्यात्म में अनुभूति में,
इंसान में निहित 
देवत्व की अभिव्यक्ति में।  
हर जीव में जन्मजात विद्यमान - 
हैं सारी शक्तियाँ समग्र ज्ञान
इस भाव की जागृति ही असली शिक्षा है, 
है योग्यता प्रवृत्ति सामर्थ्य अपार 
इस निपुणता की अभिव्यक्ति ही असली शिक्षा है। 

सुशिक्षित का पहला चिन्ह 
विकर्षणों से पूर्णतः विछिन्न
एकाग्रता का ऐसा कौशल
जैसे अग्नि सर्जन करता उत्तल। (१)

सोचने का सामर्थ्य 
है दूजा संकेत 
अतः स्वतः सुगमता से जाने 
उचित अनुचित में भेद।  (२) 

अनगिनत योजनाएँ 
जनना है तीजा लक्षण, 
किन्तु अनेकों में अल्प को चुन
समर्पित सम्पूर्ण जीवन।  (३) 

चौथा प्रतीक, हर पाठ का
वास्तविकता में प्रयोग,
स्वयं की समस्याओं का हल
स्वयं ही खोजने में सुयोग्य।  (४) 

मात्र एक जीवन ध्येय 
है पाँचवा निशान,
उपरोक्त शिक्षा की ललक 
शूर का साहस परोपकार चरित्र निर्माण,
अधिक महत्वपूर्ण  - 
हो आलोचना या प्रशंसा
हो लक्ष्य कृपालु या चिंतित,
हो देहांत आज या सदी में
न्याय पथ से कदाचित नहीं विचलित। (५) 

उत्तर सुन प्रश्नकर्ता 
पूर्णतः प्रभावित निशब्द, 
हर ओर से बरसे 
वाहवाहियों बधाइयों के शब्द! 

फिर भी जाने क्यों
रात बेचैनी
घर कर आई थी,
निराकार एक अंदर से
बाहर को चल कर आई थी।
संयोग से पूछ बैठी
वही दो सवाल
बस अंतर इतना कि 
भाषा थी अति आसान - 

शिक्षा की सीमा को देखो 
देख सकते हो जहाँ तक,
फिर सोच कर बताओ
तुम पढ़े हो कहाँ तक? 

शिक्षा - 
मेरी बुद्धिमता का चित्रण 
आजीविका का साधन। 
शिक्षा की सीमा - 
कक्षा अध्यापन डिग्री से लेकर 
परीक्षा प्रतिस्पर्धा पदवी तक। 
शिक्षा और धर्म में 
नहीं दिखता कोई सम्बन्ध,
पर मेरी धार्मिकता के
प्रमाण हैं अनंत -
धर्मरक्षक ध्वजधारक मैं 
वेद पुराण कंठस्थ,
बैठक कक्ष में 
सोशल मीडिया पर 
तर्क कुतर्क ज़बरदस्त,
मतभेद में 
निःसंकोच दुर्वचनी मैं 
अन्य धर्म जो हैं भ्रष्ट।  

मन के हर कक्ष में
तथ्यों की ढेर सजी है,
ध्यान को पांव धरने की
जगह ही नहीं बची है।  (१) 

यूँ तो मैं बहुआयामी 
विचारक कलाकार वयस्क,
पर सही सोचने की कला में
कुल जोड़ शून्यमयस्क। 
(२)  

योजनाएँ मौलिक ना सही 
पर हैं सौ से अधिक समस्त, 
और उतनी ही दिशाओं में 
मैं गर्व से अतिव्यस्त
। (३) 

निशिदिन श्रवण पाठन 
सुविचार प्रवचन दोहे पुरजोश,
किन्तु यथार्थ के    
हर संकट में संघर्ष 
हर दशा में असंतोष। (४) 

अध्यात्म अंशदान कल्याण 
तो लगते विदेशी से व्यंजन,
जीवनध्येय मात्र एक
मनोरंजन मनोरंजन मनोरंजन। (५) 

नमस्कार! पुनः शुभ प्रभात 
मुझसे मिलिए - 
मैं इस सदी का पढ़ा लिखा गंवार, 
पर गुरुकुल जाने की आयु
तो कब ही हुई है पार!     
अब बस एक चाह
कि कर जाऊँ 
एक प्रतिमा का निर्माण,
"उतिष्ठत। जाग्रत। 
प्राप्य वरान्निबोधत।"   
पर धर पाऊँ कुछ ध्यान, 
एक सदी में ही सही 
पर सत्य में बन जाऊँ
एक सुशिक्षित इंसान।  

सन्दर्भ: "My Idea of Education" by Swami Vivekanand  
Published/ Copyrighted : https://sahityakunj.net/entries/view/kahaan-tak-padhe-ho 
Background  Photo  credit: https://www.culturalindia.net/reformers/vivekananda.html 
पृष्ठभूमि: भारतवर्ष के राष्ट्रीय युवा दिवस पर मेरी नई रचना

Friday, December 30, 2022

किस मिट्टी की बनी हो?

किस मिट्टी की बनी हो?

रहस्य सी जन्मी थी 
रहस्य सी ही मिट्टी में समाओगी क्या? 
किस मिट्टी की बनी हो 
दर्पण में झाँक कर नहीं 
भीतर टटोल कर बताओगी क्या? 

  
मुझे गोद लिए एक नीली नदी
मैं श्वेत पवित्र, 
बोलूँ बिन छन्नी 
बिखेरूँ नवपुस्तक सा इत्र, 
थोड़ा फुसलाओ बहुत बहल जाऊँ
थोड़ा उकसाओ पूरी कथा सुनाऊँ, 
मन चाहे तो एक सेतु एक छोर
पर मैं धारा संग बहती जाऊँ, 
जैसे कोई “कागज़” की नाव। 
 
अब मेरे समक्ष एक पर्वत विशाल
समतल से चोटी तक
पहले ही बने पदचिन्हों के निशान, 
मैं पग पग ऊपर चढ़ती जाऊँ, 
यदि स्वयं की श्वेतता से सकुचाऊँ
भेड़चाल में रंगती जाऊँ, 
छोर को भूल 
ढूँढ़ रही बस संगी साथी 
मैं जैसे “लकड़ी” की काठी। 
 
अब मुझे घेरे एक हरा-भरा गाँव 
आढ़ी-टेढ़ी छटाओं में 
किंकर्तव्य विमूढ़ में भटकी, 
बहु एकपक्षीय सम्बन्ध निभाती 
स्वयं को भूल 
बनी दूजों की रंगबिरंगी प्रतिलिपि, 
जैसे आम्र बिन गुठली 
मैं मात्र “प्लास्टिक” की कठपुतली। 
 
अब मुझे छेड़े एक महानगर
चिकनी सुरक्षित सड़कें 
सुनियंत्रित यातायात की क़तार, 
यूँ नियंत्रित करती मुझे 
हर ऐरे ग़ैरे की पुकार, 
क्षण में बनाती 
क्षण में करती अंश हज़ार, 
दिशाहीन बिखरी यह चिड़िया 
मैं जैसे “कांच” की गुड़िया। 
 
अब मुझे परखे एक सुनसान मैदान
देख मुझे खंडित निराधार 
बिन धारणा पूछे एक सवाल 
कि आख़िर तुम्हें क्या चाहिए? 
 
नहीं चाहती—
मौसम सेहत सेवन जानने का व्यवहार
दूजों को देना स्वयं से अधिक महत्त्व अधिकार, 
पीठ-पीछे बेहिचक उपहास 
समक्ष नपा-तुला बोलने का ढंग, 
अतिव्यस्त होने का ढोंग 
आत्मलीन आत्मपूजक का संग, 
ख़ालीपन को भरने की ललक में सौ छिछले सम्बन्ध। 
 
जानती हूँ—
फिर श्वेत नहीं हो पाऊँगी
मैली परतें जो चढ़ी हैं अनगिनत 
तिरस्कारों, विफलताओं, त्रुटियों की, 
टूटी बिगड़ी कड़ियों, निकटों की मृत्युओं की। 
 
फिर भी चाहती हूँ—
ढूँढ़ूँ डंके की चोट पर 
वही बचपन का नकारा हुआ छोर, 
करूँ एक तपस्या बड़ी, 
बन जाऊँ स्वयं से स्वयं तक की कड़ी। 
 
हो जाऊँ यूँ रूपांतरित कि 
जब कोई चौंधियाँ कर पूछे 
किस मिट्टी की बनी हो तुम? 
तब मैं मुस्कुरा कर कहूँ 
मिट्टी से तो नहीं बनी 
पर जब मिलूँगी मिट्टी में
जलूँगी गर्व से तन के, 
घोर तप से बना 
एक “धातु” बन के। 
एक दिन अवश्य मिलूँगी 
जतन से खोदने वाले को 
सोनम सुनिधि बन के, 
लगन से खोजने वाले को 
जीवबिंदुएँ जोड़ता स्वर्णिम सेतु बन के।

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/kis-mitti-ki-bani-ho
Background picture credit: https://www.backyardboss.net/garden-soil-vs-other-soils/

पृष्ठभूमि: 

किस मुँह से बताएँ कि 
एक कदम उन्नत की ओर बढ़ाते ही
दो कदम पतन की ओर गिरते हैं,
फिर भी प्रयत्न करने में लगे हैं 
क्योंकि सुना है 
बारह बरस बाद तो
घूरे के भी दिन फिरते हैं। 

विश्व अध्यात्म दिवस पर मेरी नयी रचना 

Tuesday, November 1, 2022

कविता कैसी लगी?

 उपहास से पूछ लो—

सवेरे उठते ही मैंने बिस्तर क्यों बनाया नहीं
दिन के दस बजे तक मैंने क्यों नहाया नहीं
और मेज़ पर जमी धूल हटाने का
मुहूर्त अब तक क्यों आया नहीं? 
 
मार दो ज़ोरदार ताने—
चाल में धमधमाहट क्यों हैं
कपड़े फूहड़ से और बाल चीकट से क्यों हैं
पर्स में सामान इतना ठूँस ठूँस कर क्यों जमाती हूँ
बिना इस्तरी किये वस्त्रों में
निर्लज्जता से दफ़्तर कैसे चली जाती हूँ? 
 
दे दो तीखी टिपण्णी—
रसोई में हाथ सुटुर सुटुर क्यों चलते हैं
प्लैटफ़ॉर्म पर चायपत्ती के निशान कैसे बनते हैं
बुनाई सिलायी में क़तई सफ़ाई क्यों नहीं है
बढ़ती उम्र संग भी स्वभाव में ठंडाई क्यों नहीं है
महाभारत के पात्र याद क्यों नहीं रहते हैं
बातों में केवल फ़िल्मीसितारे क्यों बहते हैं? 
 
पेंचीली नज़र से जाँच लो—
हिंदी वर्तनी में कितनी त्रुटियाँ हैं
अँग्रेज़ी व्याकरण में क्या क्या कमियाँ हैं
गणित के सड़े से सवाल में अंक कहाँ कटे हैं
परीक्षा के एक दिन पहले तक सारे पाठ क्यों नहीं रटे हैं
घंटों फोन पर किससे बतियाती हूँ
ऐरे ग़ैरे अभिनेता पर क्यों मोहित हो जाती हूँ? 
 
जम कर हँस दो—
मेरे यूट्यूब देखकर साड़ी बाँधने पर
दिन की दो दर्जन सेल्फ़ियों पर
मासिक धर्म का समाचार बनाने पर
रोज़मर्रा के रस्ते पर भी गूगल मैप्स लगाने पर। 
 
आज समझ नहीं आता
क्या सही क्या ग़लत
अभिव्यंजना का हुआ
कुछ ऐसा कायापलट—
उपहासमय प्रश्न बन गए सकुचाये से सवाल, 
ज़ोरदार ताने बन गए सम्भले हुए सुर तान, 
तीखी टिपण्णी बन गयी सरस बोलचाल, 
पेंचीली नज़र बन गयी समादर का निहार, 
उड़ती हुई हँसी बन गयी मुँडेर पर बैठी मुस्कान, 
आज समझ नहीं आता
क्या ग़लत क्या सही
जाने क्यों माँ को लगता
अब मैं हो गयी हूँ बहुत बड़ी। 
 
सुना है सुकवियित्री हो
तो रच लो स्वयं को
बन जाओ पहले सी निंदक सगी, 
सुना है समीक्षक भी हो 
तो बिन छन्नी बता डालो
मेरी यह कविता कैसी लगी? 

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/kavita-kaisi-lagi

पृष्ठभूमि : 

मेरा मात्र एक सुरूप सत्य - 
तेरा कोई रूप कोई रंग ना होगा 
जिसे मैंने सराखों पर रख 
मंत्रमुग्ध हो सराहा नहीं।  

शेष हर कुरूप सत्य
है पूर्णरूपेण स्वीकार
पर तेरा यह
विरूद्ध रूप विपरीत रंग
मुझे कतई गंवारा नहीं।  

Friday, October 7, 2022

मत जगना उस रैना

पृष्ठभूमि: शरद पूर्णिमा पर संगी कवियों से मेरा लघु अनुरोध!   

मत जगना उस रैना 

मेरे प्यारे कविवर!
तुम्हे कलम की सौगंध
मत जगना उस रैना
मत लिखना ऐसा छंद -     
जिसे देखते ही 
जी ना फिसल जाए,
जो विचलित से चित्त को 
संलग्न ना कर पाए,
जिसे बारम्बार पढ़ने को
मन नहीं ललचाये,
जिसके सेवन से
भीतर की ऋतु ना बदल पाए।

मत जगना उस रैना 
मत लिखना ऐसा छंद -  
जिसमे वही पुरानी उपमाएँ
जबरन के तुकांत समाये, 
जो एकपरतीय विषय पर
मात्र बहुमत दर्शाये,
जिसमे आरम्भ से अंत रहे
मनोदशा जस की तस,
जिसकी छवि में छाया हो
मात्र एक अमावस।

मेरे प्यारे कविवर!
तुम्हे कलम की सौगंध
अपलक तारे गणना  
रच जाना ऐसा छंद -  
जो धारारुख मोड़ जाए
पत्थरों को तोड़ जाए
मन के तार मरोड़ जाए 
प्राणों को झकझोड़ जाए। 

तो बस!

त्याग दो लज्जा 
झिझक के सारे रोधक अभ्र,
मूंद लो दो नैन
बस तुम झाँक लो भीतर,
देख लो अंदर विराजित
अक्षरा के स्वर,
चीर कर अपना ह्रदय 
करो पद्य न्योछावर,   
दान दो एक घटती बढ़ती 
चेतना की सैर, 
ग्यारसों से धुलते जाएँ
मन के सारे बैर
जाग लो जब तक ना हो  
उस सूचिका में सूत
काव्य में जब तक ना हो

वह वह चौदहवीं का पूत।  

Thursday, September 22, 2022

संकेत की भाषा

 Published/Copyrighted:https://sahityakunj.net/entries/view/sanket-ki-bhasha

 पृष्ठभूमि:  "True poetry is for the listener." (असली काव्य सुनने वाले के लिए होता है) - Freddie Mercury 

My new creation on World's Sign Language Day 

संकेत की भाषा

कौन हो तुम?
मैं वह हूँ जिस पर ईश्वर ने
विशेष की मोहर लगाई थी,
कर्णावर्त तंत्रिका जन्मजात
विकसित नहीं हो पाई थी।   
मेरे जन्म पर यह जान मेरी माँ
फूट फूट कर रोई थी,
ग्लानि मे कितनी रातें
एक झपकी भी नहीं सोई थी

फिर तुम कौन सी भाषा
बोलते हो और सुनते हो?
और कौन सी भाषा में
भविष्य के सपने बुनते हो?

यह ऐसी भाषा है जिसे
आम व्यक्ति शायद ही सुन सकता है। 
क्योंकि इस भाषा को सुनने के लिए
कान की नहीं ध्यान की आवश्यकता है
हाँ, वही ध्यान जो -
दुनिया से लेने के लिए 
आपने सारे कैमरों को स्वयं की ओर मोड़ लिया है,
आत्मलीनता आत्मजुनूनी के दौर में 
आपने इसे दूसरों की ओर देना ही छोड़ दिया है

जब मुझसे कोई कुछ कहता है
मैं उस क्षण में उपस्थित रहता हूँ, 
बात को दोहराने को कभी नहीं कहता हूँ   
वक्ता की भावनाओं के अंदर तक झांकता हूँ,
अर्जुन का लक्ष्य समझ उस फ़ोन को नहीं ताकता हूँ   

जब मैं किसी से परिचय करता हूँ
उन्हें जानने के लिए 
स्वयं का पूरा अवधान संचय करता हूँ   
नाम पूछता हूँ याद रखने के लिए
ना केवल औपचार प्रकट करने के लिए 
हाल-चाल पूछता हूँ हृदयव्यथा घेरने के लिए 
ना कि उत्तर सुने बिना ही मुँह फेरने के लिए 

भविष्य का सपना विशेष तो नही
पर है श्रवणीय - 
नवाचार के अवसर को नई परिभाषा दिलाने का,  
हाव भाव पढ़ने की शैली को दुनिया को सिखाने का, 
भूली बिसरी सुनने की कला को फिर वापिस लाने का  

पर भूल कर भी मुझे भिन्न ना समझना! 
आखिर हूँ कृष्ण का ही रूप,
अतिबुद्ध उपदेशक हूं,
पर हूँ मोहक नटखट भी,
बहुत मज़ा आता है मुझे शोर मचाने में, 
ईश्वर ही जाने क्यों रोई थी माँ
मैं तो मदमस्त हूँ व्यस्त हूँ इतिहास रचाने में  

प्रवाह के विपरीत तैरते हुए 
धाराप्रवाह आती मुझे,
यह उंगली सञ्चालन से बनी 
दुनिया की सबसे अभिव्यंजक भाषा। 
माँ को गदगद कर गर्व से भरकर
ख़ुशी के आंसू देने की आशा,
मातृभाषा से ऊंचा स्थान रखती
मेरी यह संकेत की भाषा।