Friday, October 7, 2022

मत जगना उस रैना

पृष्ठभूमि: शरद पूर्णिमा पर संगी कवियों से मेरा लघु अनुरोध!   

मत जगना उस रैना 

मेरे प्यारे कविवर!
तुम्हे कलम की सौगंध
मत जगना उस रैना
मत लिखना ऐसा छंद -     
जिसे देखते ही 
जी ना फिसल जाए,
जो विचलित से चित्त को 
संलग्न ना कर पाए,
जिसे बारम्बार पढ़ने को
मन नहीं ललचाये,
जिसके सेवन से
भीतर की ऋतु ना बदल पाए।

मत जगना उस रैना 
मत लिखना ऐसा छंद -  
जिसमे वही पुरानी उपमाएँ
जबरन के तुकांत समाये, 
जो एकपरतीय विषय पर
मात्र बहुमत दर्शाये,
जिसमे आरम्भ से अंत रहे
मनोदशा जस की तस,
जिसकी छवि में छाया हो
मात्र एक अमावस।

मेरे प्यारे कविवर!
तुम्हे कलम की सौगंध
अपलक तारे गणना  
रच जाना ऐसा छंद -  
जो धारारुख मोड़ जाए
पत्थरों को तोड़ जाए
मन के तार मरोड़ जाए 
प्राणों को झकझोड़ जाए। 

तो बस!

त्याग दो लज्जा 
झिझक के सारे रोधक अभ्र,
मूंद लो दो नैन
बस तुम झाँक लो भीतर,
देख लो अंदर विराजित
अक्षरा के स्वर,
चीर कर अपना ह्रदय 
करो पद्य न्योछावर,   
दान दो एक घटती बढ़ती 
चेतना की सैर, 
ग्यारसों से धुलते जाएँ
मन के सारे बैर
जाग लो जब तक ना हो  
उस सूचिका में सूत
काव्य में जब तक ना हो

वह वह चौदहवीं का पूत।  

Thursday, September 22, 2022

संकेत की भाषा

 Published/Copyrighted:https://sahityakunj.net/entries/view/sanket-ki-bhasha

 पृष्ठभूमि:  "True poetry is for the listener." (असली काव्य सुनने वाले के लिए होता है) - Freddie Mercury 

My new creation on World's Sign Language Day 

संकेत की भाषा

कौन हो तुम?
मैं वह हूँ जिस पर ईश्वर ने
विशेष की मोहर लगाई थी,
कर्णावर्त तंत्रिका जन्मजात
विकसित नहीं हो पाई थी।   
मेरे जन्म पर यह जान मेरी माँ
फूट फूट कर रोई थी,
ग्लानि मे कितनी रातें
एक झपकी भी नहीं सोई थी

फिर तुम कौन सी भाषा
बोलते हो और सुनते हो?
और कौन सी भाषा में
भविष्य के सपने बुनते हो?

यह ऐसी भाषा है जिसे
आम व्यक्ति शायद ही सुन सकता है। 
क्योंकि इस भाषा को सुनने के लिए
कान की नहीं ध्यान की आवश्यकता है
हाँ, वही ध्यान जो -
दुनिया से लेने के लिए 
आपने सारे कैमरों को स्वयं की ओर मोड़ लिया है,
आत्मलीनता आत्मजुनूनी के दौर में 
आपने इसे दूसरों की ओर देना ही छोड़ दिया है

जब मुझसे कोई कुछ कहता है
मैं उस क्षण में उपस्थित रहता हूँ, 
बात को दोहराने को कभी नहीं कहता हूँ   
वक्ता की भावनाओं के अंदर तक झांकता हूँ,
अर्जुन का लक्ष्य समझ उस फ़ोन को नहीं ताकता हूँ   

जब मैं किसी से परिचय करता हूँ
उन्हें जानने के लिए 
स्वयं का पूरा अवधान संचय करता हूँ   
नाम पूछता हूँ याद रखने के लिए
ना केवल औपचार प्रकट करने के लिए 
हाल-चाल पूछता हूँ हृदयव्यथा घेरने के लिए 
ना कि उत्तर सुने बिना ही मुँह फेरने के लिए 

भविष्य का सपना विशेष तो नही
पर है श्रवणीय - 
नवाचार के अवसर को नई परिभाषा दिलाने का,  
हाव भाव पढ़ने की शैली को दुनिया को सिखाने का, 
भूली बिसरी सुनने की कला को फिर वापिस लाने का  

पर भूल कर भी मुझे भिन्न ना समझना! 
आखिर हूँ कृष्ण का ही रूप,
अतिबुद्ध उपदेशक हूं,
पर हूँ मोहक नटखट भी,
बहुत मज़ा आता है मुझे शोर मचाने में, 
ईश्वर ही जाने क्यों रोई थी माँ
मैं तो मदमस्त हूँ व्यस्त हूँ इतिहास रचाने में  

प्रवाह के विपरीत तैरते हुए 
धाराप्रवाह आती मुझे,
यह उंगली सञ्चालन से बनी 
दुनिया की सबसे अभिव्यंजक भाषा। 
माँ को गदगद कर गर्व से भरकर
ख़ुशी के आंसू देने की आशा,
मातृभाषा से ऊंचा स्थान रखती
मेरी यह संकेत की भाषा।  

Tuesday, September 13, 2022

क्या लगती हो तुम मेरी?

क्या लगती हो तुम मेरी?

आठ भेष में आती 
एक झिलमिल करती फेरी,
अदल बदल यूँ जाती 
मानो झट से हो पहन आती  
अलग-अलग शैली में 
एक साड़ी चंदेरी,  
छाने-बीने तो खूब
तुम्हारे चन्द्रमय बहुरूप,
फिर भी मैं हूँ अनजान अँधेरी,
नही जानती - 
क्या लगती हो तुम मेरी। 

पढ़ती मन की हर एक बात
बस धीमे से छू कर मेरी हथेली, 
करती पूरा हर वाक्य 
हर अर्धविराम के बाद की पहेली, 
लगता जैसे हो मेरी 
वह कच्ची उमर की पक्की सहेली
 (१) 

तरह तरह से रिझाते 
अधूरे-पूरे अक्षर के आकार,
श्रृंगार रस से भीगा लगता 
उपमा रूपक का संसार, 
बन जाती मैं खुद का 
सबसे सुन्दर अनुवाद, 
जब बन जाती तुम 
मेरी प्रीति मेरा अनुराग। (२) 

कभी स्पष्टवक्त अनुजा बन 
बता जाती हर रस की
सही मात्रा सही हद, 
तो कभी रिक्तपटिया सी भार्या बन 
ग्रहण कर जाती
हर कुंठा हर कटुशब्द (३) 

कभी बन शिक्षिका जड़ देती 
मन में समस्त शब्दकोष,
सिखलाती सूक्ष्म शब्द चयन

ध्वनि अलंकार गुण दोष, 
देती अभिव्यक्ति की सशक्ति  
कुछ इस भांति, 
कि लिखूँ तो काव्य 
पर पढ़ो तो क्रांति। (४)   

पहली बार देखा तो लगा 
अनंत प्रार्थनाओं के बाद 
सीधे परीनगर से आयी 
बिना किसी मिलावट के
बार बार देखा तो लगा 
जैसे मैंने ही बनाया
इसे 
अपनी लिखावट से, 
नयन-नक्श से लगती
मेरी आँखों की चन्द्रबिन्दु का तारा, 
जब बन जाती मेरी आत्मजा 
मेरे प्राणो का अंतिम सहारा  (५) 

कभी थक जाती तो 
बन जाती मेरी अवमूल्यित माँ, 
बड़ी सरलता से सिखा देती 
जीवन का कठिन व्याकरण,
एक शब्द प्रयोग ना करती 
बस दिखा देती एक सुदृढ़ उदाहरण । (६)  

जब बन जाती मां भारती 
सुधाती सारे मूल रूप 
संधियों को तोड़ मोड़ के, 
परदेस में रखती मुझे 
जड़ो से जोड़ के, 
रोक नहीं पाऊ आनंदमय अश्रु 
जब सुन लूँ अपने अंशों को 
दो शब्द भी इसके बोलते  (७) 

देती वेद मन्त्रों का उच्चारण  
वीणा वाणी की स्वरा, 
अंतस तक रखती मुझको  
उच्च-कम्पित सुशोभित खरा, 
जब जिव्हा पर उतर जाती
बन कर माँ अक्षरा  (८) 

छाने-बीने तो खूब
तुम्हारे चन्द्रमय बहुरूप,
फिर भी मैं हूँ अनजान अँधेरी,

नहीं जानती -
 
लगाऊं कौन से स्वर
सजाऊं कौन से व्यंजन,
कैसे करूँ नमन, 
दूं कौन सा उपहार?
कैसे मनाऊं यह चौदह सितम्बर का
मेरा मनभावन त्यौहार? 
अब बस भी करो 
यह रिश्तों की हेरा फेरी,
बताओ ना !
क्या लगती हो तुम मेरी?

Copyrighted/Published: https://sahityakunj.net/entries/view/kya-lagati-ho-tum-meri

पृष्ठभूमि: भारतवर्ष में मनाए जाने वाले पचासों पर्वों में से मेरे सबसे मनभावन पर्व पर सीधे ह्रदय से निकली मेरी नयी रचना - 


Tuesday, August 23, 2022

असली क्षमावाणी

published/copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/asali-kshamvani
पृष्ठभूमि: कच्ची उम्र से जैनधर्म के इस पर्व से सम्मोहित मेरी नयी रचना

असली क्षमावाणी

हाँ! उन्होंने हमें ठेस पहुंचाई! 
हाथ बने उपहारों की कीमत न चुकाई
एहसानों की सुधबुध न आई,
कौशलों की कद्र न जताई
दोषों की प्रसिद्धि करवायी,
बिन समझे ही धारणा बनाई
मन के कोलाहल की हंसी उड़ाई,
पदोन्नति पर दी न बधाई
चुनौतियों में संवेदना न दिखाई,
रक्तरंजित प्रेमपत्र के उत्तर एक चिट्ठी न आई
सालों की मित्रता पर सालगिरह याद न आई,
अंश के जन्म पर नहीं की गोद भराई
परिजन की मृत्यु पर सांत्वना न आई,
हाँ, उन्होंने हमें ठेस पहुंचाई।   

क्षमा तो मांगी नही तनिक भी
फिर भी चलो हमने उन्हें माफ किया 
पर्यूषण के अवसर पर 
अपना मन भी साफ किया। 

हाय! यह मैंने क्या किया था! 
मति मारी गई थी या चरस खा लिया था? 
सप्रेम भेंटो पर मुँह बना दिया था 
कितनों की कृपाओं को भुला दिया था,
खरी प्रतिभाओं पर प्रश्न उठा दिया था
राई सी त्रुटियों का तमाशा बना दिया था,
उनके भिन्न होने का उपहास किया था
उनकी व्यग्रता को हंस कर नकार दिया था,
दूजे की विजय को सहा नहीं था
उनके संघर्षो को सुन मन ही मन मुस्का दिया था,
निर्दोष प्रेम को झट से जुदा किया था
बचपन की मित्रता पर दार धरा दिया था,
दूजे के शुभ समाचार पर स्वयं को जला लिया था 
कुटुंबी को शैय्याग्रस्त अंततः विदा किया था,
हाय, यह मैने क्या किया था,
मति मारी गई थी या चरस खा लिया था? 

दोष तो अक्षम्य थे
फिर भी चलो आज स्वयं को माफ किया, 
पर्यूषण के अवसर पर 
अपना मन भी साफ किया। 

यह उपरोक्त वाक्य
कुछ सुने सुने से लगते हैं 
प्रतिवर्ष पुनरावृत्त हो 
फिर सधे सधे से बंटते हैं।  
पर लोग जितना सुन्दर बोलते है
जितना सुन्दर लिखते हैं,  
उतने सुन्दर क्यों नहीं दिखते हैं?
मात्र तीस के फिर साठ के क्यों दिखते हैं?
क्यों यह काले रंगे केश
हाथ फेरते ही गिरते हैं?
कहीं ऐसा तो नहीं कि 
वचन में क्षमावाणी 
पर मन में जटिल गांठे लिए फिरते हैं? 

आज पर्व के पहले दिन 
पहली बार दिल खोल ही दो 
क्षमा का यह ढोंग करना छोड़ ही दो, 
मन की गीता पर हाथ रखो
लोकमत से डरना छोड़ ही दो,  
सच सच कहो! 
क्या दूजों को
क्या स्वयं को माफ किया?

मेरे प्रिये! सच कहूँ तो,
वर्षों से निरामिष होकर भी 
तामसिक प्रवृत्ति नहीं जाती है,
माफ़ किया बोलकर भी 
स्मृतियाँ साफ़ नहीं हो पाती है,
भींख मांगने पर भी  
हमारे हिस्से क्षमा नहीं आती हैं
दर्दनाक गुत्थियाँ
पत्थर की लकीर की तरह 
वहीं की वहीं रह जाती हैं।  

खम्मामि सव्व जीवेषु सव्वे जीवा खमन्तु में, मित्ति में सव्व भू ए सू वैरम् मज्झणम् केण इ

कितना अयथार्थ 
कितना असंभव 
यह उपलक्ष्य लगता है, 
स्पष्ट प्रतीत होता है
फिर भी दूर यह लक्ष्य लगता है।  
जैन तो नही जन्मे
न बन पाए श्वेताम्बर दिगंबर,
अतितुच्छ हम कैसे जाने
इस अतिमहामना पर्व का मंतर,
फिर भी प्रयत्न करते हैं 
इसे सीधे पंचपरमेष्ठी से सीखने का, 
घोर साहस करते हैं 
इसे स्वरचित शब्दों से देखने का।  

हे अरिहंत! मुक्ति दो 
मन की जटिल गुंथन से
काया की वजनी जकड़न से ।

हे सिद्ध! भर दो 
उत्तमक्षमा को चित्त में ह्रदय में प्राण में।    

हे आचार्या! शक्ति दो 
स्वयं को क्षमा कर पुनः आत्मविश्वास धरूं।

हे उपाध्याय ! शक्ति दो
दूजों को क्षमा कर पुनः विश्वास कर उन्हें वरदान दूं।

हे मुनि! शक्ति दो 
विषण्ण क्रोध के पीढ़ीगत प्रतिरूप से 
स्वयं को वंशजों को चिरस्वतंत्र करूँ।  

Friday, August 12, 2022

अमर प्रेम

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/amar-prem

अमर प्रेम 

लोग कहते हैं मैं बदल गई 
मेरे शोले से प्रेम की अग्नि 
तीली की ज्वाला सी ढल गयी।   

हाँ सही तो है 
मैं बदल गयी,
पर बदली नहीं मैं आज 
बदली थी जब 
है वह डेढ़ दशक पहले की बात।   

तुझसे बिछड़ने से पहले
कंठ में अकाल सा पड़ा था
पर इस जिव्हा को 
तेरे उपनामों की चाशनी सहला रही थी।  
कुर्सी को सीधा करने के प्रयत्न में 
छू रही थी मैं आसपास के बटन
पर इस चर्म से 
तेरे स्पर्श की ही खुशबू  रही थी।   
गूंजा तो था 
कुर्सी की पेटी बाँधने का सन्देश
पर इन कानों को 
एक बारम्बार धुन सता रही थी।
जहाज के उड़ान भरते ही
कम हुयी थी आसपास की हवा
पर इन साँसों में  
तुझसे उठती एक कम्पन समा रही थी।    
जब तक दिख रहे थे तुम 
उस रोशनदानी खिड़की से 
यह आखें अश्रुवर्षा से 
केवल प्रेम बरसा रही थी।    

कैसे समझाऊं कि 
मैं क्या 
मेरी तो हर इन्द्रिय ही बदल गयी थी।   

यहाँ परोसे जा रहे 
मुझे मेरे ही धर्म के 
कटु अपक्क से चित्र,
पर मैं उपजती जाऊँ  
सरस आस्थाओं से पोषित 
एक पवित्र चरित्र, 
चख जो सकती हूँ
पुण्य पंथ की मिठास को।     

छेड़े जा रहे 
जातिवाद के आरोप बारम्बार,
पर मैं करती जाऊँ
मात्र मानवता की वंशावली का विस्तार
छू जो सकती हूँ
पूर्वजों की कीर्ति रश्मियों को।     

ललकारते जा रहे  
कोलाहलमय कट्टरता के आरोपण,
पर मैं चुपचाप रचती जाऊँ
एक प्रगतिशील उदाहरण,
सुन जो सकती हूँ
बढ़े चलो की पुकार को।  

हवाओं में है 
बोलचाल की शैली की ठिठोली
पर मैं जलाती जाऊँ
बहुभाषिता में निहित संघर्षों की होली, 
सूंघ जो सकती हूँ
सुबाड़वाग्नि की सुगंध को।   


घूरे जा रहे 
नारी के विरुद्ध पक्षपात के अभियोग
पर मैं दर्शाती जाऊँ 
सशक्त स्वतंत्र स्री का योग
देख जो सकती हूँ 
हिमाद्रि पर बैठी स्वयंप्रभा समुज्ज्वला को।   

और कैसे समझाऊं कि 
मैं क्या 
मेरी तो हर इन्द्रिय ही बदल चुकी है।  

प्रेम पर संदेह था 
तो पुनः आती हूँ इस भाव पे
यूँ बसा चलती हूँ 
तुझे हर हाव भाव में,
कि हर कोई पूछ बैठे 
क्या अभी अभी आयी हो 
बैठ किसी तिरंगी नाव में।  
मेरे जन्म पर ही झटके से तोड़ा था
उस नौमासी गर्भनाल को,
पर अंतिम शैय्या तक ले जाउं 
तुझ संग जुड़े इस जीवंत तार को।     
वह अपूर्व प्रेम फीका पड़ जाए 
देख तुझ संग प्रीत के राग को,
एक दिन अवश्य बुझेंगी 
तेरे विरुद्ध सतही विश्वधारणाएं 
देख मेरी भक्ति की आग को।  

इस पंद्रह अगस्त
चाहूँ मैं भी स्वतंत्रता 
मुझ पर भिन्नता के आरोप से 
मेरे बदल जाने के जनप्रकोप से।
नहीं समझ पाऊं कि लोग  
मुझे भिन्न खिन्न होता देख 
यूं जश्न क्यों मनाते हैं
कहते हैं दूरी प्रेम बढाती है,
फिर मेरे देशप्रेम पर प्रश्न क्यों उठाते हैं

अगले बरस जो फिर दिखूं मैं 
थोड़ी और बदली बदली सी,
पढ़ लेना मेरी भी पृष्ठकथा 
एक धीरा समझ के
या चाहो तो भिड़ लेना मुझसे 
एक प्रवीरा समझ के
या छोड़ देना मुझे मेरे हाल पर
हर बरस मात्र एक दरस को तरसती
एक मीरा समझ के।   

 

पृष्ठभूमि:
देश को विश्व के कण कण में बसाने वाले 
देश की संतानों के विरुद्ध विश्वव्यापी पूर्वधारणाएं तोड़ने वाले
हर प्रवासी के लिए मेरा "अमर प्रेम"
जय हिन्द! 

सन्दर्भ: 
१. https://www.hindikunj.com/2021/08/himadri-tung-shring-se-poem.html 
२. http://purishiksha.blogspot.com/2018/09/bcom-1st-year-hindi.html
३. https://en.wikipedia.org/wiki/Anti-Indian_sentiment 

४. https://www.asianstudies.org/wp-content/uploads/breaking-free-reflections-on-stereotypes-in-south-asian-history.pdf

५ . https://www.diversityinc.com/six-things-you-should-never-say-to-south-asian-americans/ 

६. https://www.amazon.com/Stereotype-Global-Literary-Imaginary-Literature/dp/0231165978