Tuesday, July 19, 2022

रिश्ते की अर्थी

 उस अमूल्य खंडित रिश्ते का क्या किया?

जादू टोने से भुला दिया 
या किसी कविता के तुकान्तों में झुला दिया?
बेहोशी की सुई घुसा अवचेतन मन में बुझा दिया
या स्वर्णपदक सा मानसपट पर सम्मानजनक सजा दिया? 

रिश्ते की अर्थी 

इस प्रबुद्ध संसार में
हमने की अपवादों की आशा, 
जतन से खोजे सौ बावरे 
और पूछी जीवन की परिभाषा, 
एक सुर में बोले - 

कल तक जो था
खुले हाथों से सींचा 
हरे भरे संबंधों का बगीचा, 
आज है मात्र 
कंपकंपाते हाथों से थामा 
क्रमशः मुरझाता हुआ एक गुलदस्ता,
हृदय के हर एक खंड में है अटका 
एक अलग खंडित रिश्ता।  
कोई जबरन खिंचता है 
तो कोई मरम्मत के लिए तरसता है, 
कोई रक्त सा रिसता है 
तो कोई अश्रु संग बरसता है, 
और एक तो कुछ यूँ पसरता है
जो दशकों तक बिछड़ कर भी 
कण भर भी ना बिसरता है 

जीवन के खालीपन को
सहजता से भरता हुआ, 
अकारण ही
अनंत अधिकार करता हुआ,
किसी नए फ़िल्मी गीत की तरह 
मन पर मंद-मंद चढ़ता हुआ, 
वह कच्ची उम्र में बना बेनाम रिश्ता
संग ले आया था 
गहरी मित्रता भावनात्मक सुरक्षा 
अनुभूति आत्मीयता,
डरी सहमी अंतर्मुखी 
अतिपराश्रित अतिसुरक्षित सी मुझको 
दे गया था एक आस
एक अनूठा "आत्मविश्वास" 

पर मंदभागी था वह संबंध
नहीं मिला कोई अर्थ कोई अंत,
अनगिनत कारण कुछ गलत कुछ सही
अनगिनत विनती मगर नहीं तो नहीं
जो हुआ सो हुआ कहकर आगे तो बढ़ी
लौटाए उपहार तोड़ दी हर कड़ी,
सोचा उस ही आत्मविश्वास के सहारे 
फिर हो जाऊँगी अपने पैरों पर खड़ी,
पर आत्मविश्वास का तो 
दूर दूर तक नहीं था कोई नाम  
संग ही लुप्त हुआ था आत्मसम्मान,
सिर पर हाथ रख कर बैठी ही थी 
कोस रही थी जीवन का यह अनचाहा रोध, 
अकस्मात् दिखा एक अनदेखा अंश 
नाम था जिसका "क्रोध" 

बेहिसाब आता क्रोध 
हर दिन हर रात आता क्रोध, 
निन्यानवे प्रतिशत स्वयं पर आता क्रोध,
क्यों नही थी मैं योग्य
और क्यों नही समय पर आया बोध?
कई वर्ष यूँ छिपा मेरे भीतर 
कि भनक नहीं लगी किसी को तनिक भी,
फिर धीरे धीरे हुआ स्पष्ट दृश्यमान 
मेरी भाषा में कर्मों में 
चरित्र के विभिन्न रंगों में 
चिरकारी दर्द के रूप में अलग-अलग अंगों में। 
एक दिन सहा ना गया 
चिल्ला कर झल्ला कर मैने पूछ ही लिया - 
भाई! क्यों सता रहें हो
ना सोने देते हो ना जीने ना मरने,
आखिर चाहते क्या हो?
क्रोध ने मुस्कुरा के
बड़ी मधुरता से दिया मुझे टोक -
मैडम, मैं क्रोध नहीं हूँ
मेरा असली नाम है "शोक" 

मैं वही सूक्ष्म कण हूं
जिसे आगे बढ़ने की शीघ्रता में 
आपने पल्लू से झट से झाड़ दिया था,
घोर निर्दयता से अतीत के 
उस पन्ने को फाड़ दिया था, 
मैं हूँ वह बच्चा
जो अपनो की गरमाहट से वंचित रह जाता है
और फलस्वरूप सारा शहर ही जला जाता है,
एक बार देखती तो सही, 
गले से लगाती तो सही,
मुझे समझती तो सही,
जी भर आंसू बहाती तो सही,
वर्षों पूर्व ही मिला होता
आपको मनवांछित समापन! 
इतना कहकर 
पुनः मुस्कुरा कर शोक विदा हुआ,
बीस-बीस की पश्चदृष्टि से स्पष्ट दिखा 
कि अतीत में आखिर क्या हुआ,
सौभाग्य से पुनः मिला वही अनूठा आत्मविश्वास
लौट के आया था जैसे मनाने कोई जश्न
भरी सभा में उठा गया मेरे मन में कुछ "प्रश्न" 

किसी जीवित संग रिश्ते की मृत्यु 
किसी इंसान की मृत्यु से कम क्यों होती है? 
क्यों इस मृत्यु को छिपाना पड़ता है
भावनाओं को अंतस तक दबाना पड़ता है?
क्यों चुप रहकर ही सम्मान मिलता है
कुछ बोलो तो उपहास मिलता है? 
क्यों झट से आगे बढ़ने पर भी
हम रह जाते हैं वहीं के वहीं? 
क्यों किसी को पता ही नहीं
कितनी रातों से हम सोए ही नहीं? 
क्यों नही आई थी तुम रूदाली?
क्यों नहीं मिली उस रिश्ते को 
योग्य आदरांजलि श्रद्धांजलि?
क्यों नही आया था कोई मनाने 
और समझाने कि भगवान की है यही मर्जी? 

सारे प्रश्नों का एक उत्तर 
एक प्रतिशत उत्तरदायी नियति से 
एक विलम्बित विनती -
काश! धँस जाती मैं
डस लेती मुझे यह कलयुग की धरती
या मिल गयी होती 
उस ही गुलदस्ते से सजी 
मेरे रिश्ते को एक अर्थी! 

Published / Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/rishte-ki-arthi 

सन्दर्भ: 

उस अमूल्य खंडित रिश्ते का क्या किया?
जादू टोने से भुला दिया
या किसी कविता के तुकान्तों में झुला दिया?
बेहोशी की सुई घुसा अवचेतन मन में बुझा दिया
या स्वर्णपदक सा मानसपट पर सम्मानजनक सजा दिया? 

Thursday, June 23, 2022

आज की मधुशाला

आज की मधुशाला 

तुझे देख देख सोना
तुझे देख कर ही जगना,
तुझे देख कर ही
भोजन के फांक फांक चखना

जब से मिला तेरा चतुर अवतार,
जीवन में आयी मानो डोपामिन की बहार, 
तुझसे ही मिला यह विशेष समाचार
मेरे अनुयायी करोड़ 
और चाहने वाले हज़ार। 
र्दन झुकी उँगलियाँ व्यस्त
आँखें चौंधियाई मन मदमस्त, 
निरंतर संपर्क की ललक जबरदस्त, 
एक तिहाई दिनांश
मात्र चुटकी में ध्वस्त।  
बिन सुई बिन धागा 
मैंने ही पिरोयी
यह तृष्णा की माला,
बिन उम्र की रेखा 
मैंने ही सजाई 
यह आज की मधुशाला।  

तो क्या हुआ कि 
है रीढ़ सम्बन्धी कुरूपता 
भारकेंद्र आगे को झुकता ,
कंधे अतिसख्त   
मानो उन पर बैठा
कोई आठ वर्षीय बालक,
डिस्क को स्पर्शती नस नस
अंग अंग में खिंचाव शूल दर्द, 
स्पोंडिलाइसिस सांस की विरलता

उँगलियाँ सुन्न कोहनी क्लिष्ट
कभी दर्दनिवारक तो कभी शल्यचिकित्सा।  
पर डरें वह मेरी निष्कलंक तस्वीर पर 
अंगूठा न दिखाने वाले दुश्मन
मेरा शारीरिक स्वास्थ्य तो है नम्बर वन,
क्योकि मैं तो युवा हूँ जवां हूँ 
अब तक नशे में कहाँ हूँ। 

तो क्या हुआ कि  
है नोमोफोबिआ का आक्रमण 
बेचैनी जुनूनी चिड़चिड़ापन 
सीने में तीव्र गरमाहट,
करोड़ों वाहवाहियों के बीच
एक नकार की खटक,
प्रयोग के दौरान अनंत आनंद 
तत्पश्चात मन की थकावट, 
असीमित स्तर
अनंतता का भोग, 
फिर भी अविजयी सा भाव
आतंरिक रिक्तता का रोग। 
पर डरें वह तीखी टिपण्णी करने वाले दुश्मन 
मेरा मानसिक स्वास्थ्य तो है नम्बर वन,
क्योंकि मैं तो युवा हूँ जवां हूँ 
अब तक नशे में कहाँ हूँ। 

तो क्या हुआ कि 
है अतिसक्रियता  वाकविकार 
मिरगी आनाकानी
ध्यानाभाव का विस्तार,
निर्बल होता आत्मसम्मान
दुर्बल होते सामाजिक सम्बन्ध
बढ़ती हुयी अनिद्रा,
घटती हुयी संज्ञानात्मक क्षमता,
तुलना के चलन में 
प्रकृति से परे आत्मज्ञान से दूर, 
मृगतृष्णा सी दौड़ में 
अभाव की बढ़ती हुयी भावना से मजबूर।  
पर डरें वह आए दिन 
विश्व भ्रमण करने वाले दुश्मन, 
मेरे तंत्रिका तंत्र मस्तिष्क तो हैं नम्बर वन,
क्योंकि मैं तो युवा हूँ जवां हूँ 
अब तक नशे में कहाँ हूँ। 

चलो माना हो नशे से दूर
अपनी सोशल मंडली में सबसे मशहूर,
अधिकार से चलाते
यह समकोणी अलंकार, 
क्या जाना है 
इसे चला रही एक धुरंधरी सरकार?  
हैं भरे पड़े 
मनोवैज्ञानिक
भव्य संगणक विशेषज्ञ
और कैसिनो वाले ध्यान अभियंत्रक।
तेरी रुचियों को
जितना नहीं जाने तेरा परिवार, 
क्षण में दिखा देती
कृत्रिम बुद्धिमता
अरबों के आंकड़ों से जन्मी 
यह संस्तुति की कतार। 
यह सोशल मीडिया महाकायों
संग विज्ञापकों के संबंध
है तुझसे कई गुना 
अधिक अकलमंद अधिक समझदार,
तुझे व्यसनी बनाये रखना ही 
इनका प्रमुख ध्येय प्रमुख व्यापार।  

चलो माना हो नशे से दूर
अपनी सोशल मंडली में सबसे मशहूर।
जितने कस के थामे हो यह 
हथकड़ी सी मशीन, 
उतने रस से समझ लो 
निहित रसायन रंगीन।  
काली रात में नीली ज्योति का दिन
रोक देता है निद्राप्रेरक मेलाटोनिन,  
वह बढ़ती हुयी ईर्ष्या के तोल मोल 
जन जाते हैं हानिकारक कोर्टिसोल।
आज है तुरंत संतुष्टि की लत
निरंतर आनंद की आरज़ू,
पर जन्मजात आता तुम्हे
भंग करना यह डोपामिन का चक्रव्यूह,  
क्या पुनः पाना है 
स्वास्तित्व आतंरिक मान्यता
असली स्पर्श असली सम्बन्ध?
क्या पुनः कमाना है  
चिरकालिक संतुष्टि
ब्रह्माण्ड हेतु कृतग्यता का भाव? 
यदि हाँ, तो बस चलाना होगा  
ऑक्सीटोसिन-सेरोटोनिन का रामबाण,
बनानी होगी मधुशाला के बीचोंबीच
एक कमलमय मीनार। 

तो कांधों की रेखा में
सजगता से रख यह नेत्र,
सचेतन स्वीकारो कि हो
तुम व्यसनी नंबर एक। 
यदि सत्य में 
त्याग सको यह नित्य नकार,
मानना स्वयं को
एक वर्चस अवतार।
ईश्वर प्रदत्त पृथक गुण कौशल
प्रकृति प्रदत्त कितने उपहार,  
है अब तक अप्रयुक्त 
तंत्रिकोशिकाओं से रचा
एक मस्तिष्क ढलनदार,
जिस छोर को ढूंढा
हर अंतरजाल हर संजाल
तेरे भीतर ही कहीं है,
नशे में तो नरक था
असली जीवन असली स्वर्ग
बस यहीं है यहीं है यहीं है। 


Copyrighted/Published: https://sahityakunj.net/entries/view/aaj-ki-madhushala

सन्दर्भ:

१.  संदीप महेश्वरी की "Caught in the web" वेब सीरीज पर आधारित (https://www.youtube.com/watch?v=ZyBzECeeydY) 

२.  पहली दो पंक्तियाँ  हिंदी फिल्म गीतकार आसिम रज़ा की रचना (फिल्म कलयुग) पर आधारित 

विश्व नशामुक्ति दिवस (World De-addiction Day) के सचेत अवसर पर मेरी नयी रचना  


Friday, May 20, 2022

भ्रमजननी

भ्रमजननी 

ऐ मेरे वंशधर! 
जिस क्षण बना था वह 
दो गुलाबी रेखाओं का रोचक समाचार, 
उस क्षण से बना है तू  
मेरी हर मंशा का राजकुमार।   

मेरा तेरा सम्बन्ध 
सरल सीधा स्पष्ट,
मैं तेरी 
पालिका
निर्णायिका परिवर्तक, 
 
तेरी विजय हेतु उत्सुक 
छवि हेतु अतिसजग।  

हर क्षण में भरे 
गतिविधियाँ आहार कार्यभार,

हर कण में भरे 
खिलौनें जुगत उपहार।   
तेरी शुद्धि हेतु लायी
प्रवचनों की बौछार, 
तेरे सिद्धि हेतु लगायी
नियमों की कतार।  

पर! उत्तर में मिल रहा
एक अनोखा बर्ताव
क्षण क्षण नए आवेश
नए टकराव नए बुलाव,
कभी असत्य कभी चोरी
कभी तिरस्कार तो
कभी बंद बोलचाल, 
निशिदिन सेवा
निरंतर निष्ठा
और हाथ आया  
मात्र एक लुप्त सरोकार! 

ऐ प्रदर्शक भ्रमजननी!
सर्वजानकार योजनाकार, 
आओ हम भी सुना डालें   
एक विलोम समाचार - 

तेरा यह सम्बन्ध
रैखिक नहीं पर है गोलाकार,
तू नहीं कोई पालिका
तेरा प्रतिपालक है यह नेत्तृत्वकार,
तू नहीं कोई निर्णायिका
स्वयं निर्णयात्मक है यह जन्मजात बुद्धिमान,
तू नहीं कोई परिवर्तक
अपितु तुझे ही मिला है
परिणत होने का 
एक निमंत्रण स्वर्णधार,
यदि कभी जान पाएगी यह भेद
शब्द नहीं जुटा पाएगी
प्रकट करने को आभार। 

न्योछावर किया था
वस्तुओं क्रियाओं का भण्डार, 
पर अपेक्षित था मात्र
भावुक समक्षता स्वीकृति का उपहार।  
झल्ला कर बोली थी 
तू क्रोध न कर, 
चिल्ला कर बोली थी 
तू मृदुता से बोला कर, 
व्यग्र हो बोली थी 
तू ध्यान धरा कर, 
जब मानहर नाम दिए थे 
करके अनंत अधिकार 
तब तेरे शब्दों से बना रहा था  
एक आतंरिक संसार, 
पहले विचारा न होगा 
अतिव्यस्तता अहं के कारण
पर आज सोच   
कहीं दे तो नहीं रही   
तू एक विसंगत उदाहरण। 

तेरी इस व्यथा का है ही नहीं
तेरे वंशधर से जुड़ा कोई तार,
वह हर उपद्रवी उत्प्रेरक बर्ताव 
असल में है- 
तेरे उपेक्षित भावों को
समक्ष लाते दर्पण के समान, 
कष्टों की जड़ों तक पहुँचाता
एक अग्रिम सोपान,
चैतन्य की ओर खींचता
एक निमंत्रण महान।

ऐ जननी! दे दे एक और जन्म 
कर स्वयं का पुनर्जन्म  
बन एक आध्यात्मिक संगिनी, 
प्रचलित अचेतावस्थाओं की भंगिनी,
चेतना से परिपूर्ण भागीरथी। 
तेरी मंशा को ललकारेंगे
जब कभी तेरे अंश के जीवन में 
वयस्कता के उत्कंठन
आर्थिक संकट 
संगियों के दबाव  
किसी निकटतम संबंध में 
आत्मीयता का अभाव, 
तब उस ही गंगा में गोता खा
पुनः स्वतः सशक्त होगा तेरा वह राजकुमार,
तब समझ लेना 
सफल हुई तेरी समक्षता 
सिद्ध हुआ तेरा यह सोनम सरोकार।

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/bhramjanani
सन्दर्भ: "The Conscious Parent: Transforming Ourselves, Empowering Our Children" by Shefali Tsabary 

धुरंधरों को तक नानी याद दिला देता है 

निःसंदेह इस युग का सबसे दुष्कर कार्य है - बच्चे की परवरिश 

डॉ. शेफ़ाली टसबरी (@doctorshefali) की किताब "The conscious parent" का सार बटोरती अंतर्राष्ट्रीय अभिभावक दिवस पर प्रस्तुत 
मेरी नयी रचना 

Tuesday, April 26, 2022

शुभ समाचार

शुभ समाचार


क्या बताऊँ अपनी व्यथा ऐ संसार
वर्षों से था इस क्षण का इंतज़ार, 
भावविभोरता की सारे हदें हुई पार
है ही कुछ ऐसा यह समाचार। 
मेरे मन से जिसका मन बन रहा 
दिखाने है उसे मन के सारे तार, 
मेरे हृदय से जिसका हृदय चल रहा
करनी हैं उससे सहृदयी बातें दो चार। 
  
“ॐ भूर्भुवः स्वः” 
जपकर दिया यह आमंत्रण 
शेष शब्दांश-ग्रंथियों का 
कर डाला फिर चीर हरण-
  
“तत्” से तापिनी से याद आया 
बहुत सीमित है मेरे सफलता के मापदंड, 
तुम प्रगति को एक नयी परिभाषा दिला जाना। 
“स” से सफला से याद आया 
हर विवाद पर लड़-झगड़ जाती हूँ मैं, 
तुम पराक्रम को दयालुता से संवेदना से ही दर्शाना। 
“वि” से विश्वा से याद आया 
छोटे परिवार के दायित्वों को ही समझ नहीं पायी हूँ मैं, 
तुम जगतकर्तव्यों को भी पूर्णतः निभा जाना। 
“तुर” से तुष्टि से याद आया 
जाने कितनों से कुढ़ कर बैठी हूँ मैं, 
तुम इन गाँठों को खोल मानव कल्याण कर जाना। 
“व” से वरदा से याद आया
अनंत अंशों में बिखरी हुई हूँ मैं, 
तुम पंचकोशों के योग से सदा एकत्रित रह जाना। 
“रे” से रेवती से याद आया 
प्रेम को अन्यत्र खोजकर स्वयं को खो चुकी हूँ मैं, 
तुम आत्ममूल्य जान पहले स्वयं की प्रेमिका बन जाना। 
“णि” से सूक्ष्मा से याद आया
धन को वस्तुओं से तोलती रही हूँ मैं, 
तुम दुर्लभ इंसानियत का धन अर्जित करती जाना। 
“यं” से ज्ञाना से याद आया 
अपने तेज को ख़ुद ही नहीं देख पायी हूँ मैं, 
तुम अपनी अन्तःचिंगारी से जगत प्रज्ज्वलित कर जाना। 
“भर” से भर्गा से याद आया 
अनजाने में परजीवियों को पनाह दी है मैंने, 
तुम सर्वप्रथम अन्तःज्योति की रक्षा कर जाना। 
“गो” से गोमती से याद आया 
बुद्धिमता को अंकों से आँकती रही हूँ मैं, 
तुम स्नेह और दया को ही बुद्धि के सर्वोत्तम रूप बना जाना। 
“दे” से देविका से याद आया
अवांछित वृत्तांतों से उभर नहीं पायी हूँ मैं, 
तुम दमन से दयालुता से धैर्य से स्वयं के घाव भर जाना। 
“व” से वराही से याद आया 
निष्ठा के भावार्थ को सहूलियत से बदल जाती हूँ मैं, 
तुम भक्ति की हर कसौटी पर खरी उतर जाना। 
“स्य” से सिंहनी से याद आया 
जनमान्यताओं को अपना समझ बैठी हूँ मैं, 
तुम टकसालों को अनसुना कर अद्वितीय धारणाएँ बना जाना। 
“धी” से ध्याना से याद आया 
अपनी ऊर्जा हर दिशा में फैला देती हूँ मैं, 
तुम अपने पवित्र प्राणों को पिशाचों से बचा जाना। 
“म” से मर्यादा से याद आया 
बिन बात प्रतिक्रिया दिखा देती हूँ मैं, 
तुम उत्तेजना और अनुक्रिया के मध्य रिक्तस्थान को धरण कर जाना। 
“हि” से स्फुटा से याद आया
अधजल मटकी सा शोर मचा जाती हूँ मैं, 
तुम शान्ति से हर तप-साधना की प्रतिध्वनि सुना जाना। 
“धि” से मेधा से याद आया
कल को भूल आज भूल कर जाती हूँ मैं, 
तुम दूरदर्शिता धरण कर जीवन ध्येय को हर पल चित्त पर बिठा जाना। 
“यो” से योगमाया से याद आया 
अध्यात्म की सतह भी नहीं खरोंच पायी हूँ मैं, 
तुम पूर्णतः जागृत हो प्रबुद्ध आत्मा बन जाना। 
“यो” से योगिनी से याद आया 
दिन के आधे काम अधूरे छोड़ जाती हूँ मैं, 
तुम पूर्ण सक्षमता से उत्पादन का उत्तम उदाहरण दिखा जाना। 
“नः” से धारिणी से याद आया 
जैसे को तैसा की होड़ में कड़वी हो चुकी हूँ मैं, 
तुम अंतर्मन की सरसता को हर दशा में बना रखना। 
“प्र” से प्रवभा से याद आया 
भेड़चाल चलते-चलते सिद्धांतों से विचलित हुई हूँ मैं, 
तुम आदर्शों पर अडिग नए रास्ते बना जाना। 
“चो” से ऊष्मा से याद आया 
छोटे मोटे रोड़ों पर आँसू बहा जाती हूँ मैं, 
तुम बड़ी बाधाओं को भी हँस कर हटा जाना। 
“द” से दृश्या से याद आया 
दूजों की बातों में आ घोर निर्णय ले जाती हूँ मैं, 
तुम अनगिनत मतों के बीचों-बीच अपना विवेक सँभाल रखना। 
“यात” से निरंजना से याद आया 
अपनी ही जटिलता में उलझी हुई हूँ मैं, 
तुम आत्मलीनता को त्याग सेवा को स्वभाव बना जाना। 
 
अहोभाग्य मेरे जो
तुमने चुना मुझे शुभ योग से, 
तुम भी जान लेना कि 
आई हो चयन से ना कि मात्र संयोग से। 
आज हर क्षुद्र मोच पर खरोंच पर, 
कस के थाम लेती हूँ माँ के पल्लू को, 
पर प्रसव के उन घंटों में मुँह से चू भी ना निकालूँगी, 
माँ गायत्री की सौगंध! 
बिन दर्दनिवारक बिन शल्यचिकित्सा तुम्हें इस संसार में लाऊँगी। 
जाने क्या किया अब तक रिश्तों का मैंने 
पर यह रिश्ता सम्पूर्ण समर्पण से निभाऊँगी। 
 
विनती है तुमसे
मेरी इन त्रुटियों को क्षमा कर जाना, 
इन स्वीकारोक्तियों के पश्चात भी
मेरे मातृत्व के निमंत्रण को स्वीकार कर जाना, 
माना अभी हो शून्य की दूरी पर
गुणों के परिमाणों में मुझसे कोसों दूर हो जाना, 
मुझ से निकल कर मुझ सी ना रह जाना, 
इस संक्षिप्त गर्भ संवाद को अंतस तक ग्रहण कर जाना 
और एक दिन मुझसे बहुत भिन्न बहुत बड़ी बन जाना। 

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/shubh-samachar

सन्दर्भ: 

मातृत्व के आरम्भ के मिश्रित भावों को समर्पित 
पुरातनकाल की गर्भ संवाद प्रथा से प्रेरित 
मेरी आधुनिक रचना "शुभ समाचार" 

Sunday, March 20, 2022

काव्य क्यों?

Published: https://sahityakunj.net/entries/view/kaavy-kyon 

आखिर लोग कविता लिखते ही क्यों है?

अंतर्राष्ट्रीय काव्य दिवस पर इस प्रश्न का उत्तर देती मेरी नयी रचना
"काव्य क्यों?"

काव्य क्यों?

एक बात कतई समझ ना आए
क्यों लिखती हो यह लंबी-चौड़ी
विचित्र विषयों वाली कविताएँ? 
लगता दूजा कोई काम न आए,
जो व्यस्त कर अंगुलियों को
बनाया यह अतरंगी व्यवसाय। 

एक बेरंग कागज़ 
दो-चार रंगो की स्याहियों का फुंवारा, 
चंद घंटो में होगा 
चंद शब्दों का तुकांत संवारा,
अंत में इठला कर लिखती हो 
दो अक्षर का नाम तुम्हारा,
मात्र इतना ही ना 
तुम्हारी  काव्य-कथा का किनारा? 

अवयः केवलकवयः कीरा स्युः केवलं धीराः।
वीराः पण्डितकवयस्तानवमन्ता तु केवलं गवयः॥

उफ़! इस ओर जो
यूँ अंगुली उठाई है, 
प्रतिवचन में हर अंगुली मेरी 
काव्य-उड़ान भरने को फड़फड़ायी है।  
क्या बताऊँ
अकथनीय काव्य की यह कथा है,
व्यवसाय नहीं 
यह तो एक विशिष्ट व्यथा है। 
मत पूछो कब लिखते हैं 
यह पूछो कब नहीं लिखते हैं।
आज बिक जाते हैं इंसान, 
बस कविमन से निकले
शब्द नहीं बिकते हैं।   

चंद मिनट पढ़ कर
सत्तानवों ने नकारा,
दो ने सरसरी आखों से सराहा, 
मात्र एक ने
दस बार पढ़ सम्मानजनक
 स्वीकारा।    
भावुकता यूँ लुप्त हुयी
कि गिनती के सरगर्म दिखते हैं,   
तो भूल कर भी ना समझना 
कि हम पाठकों को रिझाने के लिए लिखते हैं।  

तुम्हें दिखे जो 
सीमित शब्दकोष से निकले 
शब्दों की बूंदाबांदी,
है वह अनगिनत आयामों से निकले
मूसलाधार विचारों की आंधी
।   
तुम्हें लगे जो 
चतुर्रंगी स्याही की फुलवारी, 
है वह चेतन मन, अवचेतन मन,
हृदय और प्राण से निकली 
चतुर्धाम की सवारी।  

जब चेतन मन से निकलती 
इन्द्रियों की ग्रहणशक्ति की पुकार, 
कुछ शिकायत कुछ सुविचार 
कुछ सुधार कुछ आभार,
अति ऊहापोह से मुक्ति के लिए 
सौंप देते हैं किसी दैनंदिनी को 
रैन का चैन पाने के लिए।  

जब अवचेतन मन से निकलती
अंतःकरण के आघातों की कराह
कुछ गांठे कुछ कड़वाहट 
कुछ स्वीकारोक्तियाँ कुछ घबराहट, 
जिनकी औषधविज्ञान में कोई दवा नहीं होती,
सौंप देते हैं अंतरजाल के अंड को 
अन्तःशान्ति पाने के लिए।  

जब ह्रदय से निकलती
ह्रदयवासियों से संवाद की भाषा,
गुज़रो को अंतिम बिदाई देकर भी 
धरण करने की आशा, 
बिछड़ों को पूर्णतः खोकर भी 
पाने की अभिलाषा, 
जो कागज़ जला कर भी भस्म नहीं होती,  
सौंप देते हैं ब्रह्माण्ड के कम्पन को   
हृत्स्पंद निरंतर चलाने के लिए।   

जब प्राण से निकलती 
प्रभु से प्राणमयी प्रार्थनाएँ,
क्या त्यागें क्या अगले जन्म संग ले जाएँ,
प्रबुद्ध शुद्ध बनने का बोध आ जाए,  
जो नश्वर प्राणियों से व्यक्त न कर पाएँ,
सौंप देते हैं स्वर्ग के किसी अभ्र को 
प्राणपुण्य कमाने के लिए।  

[... continued from above] 

कविमन कैसे समझाएँ तुम्हें
कभी पश्मीना सा कोमल
कभी फ़ीते सा खिंचता है,  
शब्दों से इसका कुछ अलग ही रिश्ता है, 
कच्ची उम्र से ही 
हर मंजुल छंद पढ़ अंदर तक हिल जाते थे, 
हर पात्र की पृष्ठकथा सुन आंसू बहा जाते थे, 
प्रश्नों के उत्तर लिखते लिखते  
स्वरचित काव्य की छाप जमा जाते थे।  
सयाने हुए तो देखा 
असली संसार में है ही नहीं 
शब्दों का मोल भाषा का भाव,
बस सुनने पढ़ने में आता
एक लठ्ठमार प्रभाव,     
लोग प्रयोग के पूर्व 
शब्दों को तोल नहीं पाते हैं, 
और अपशब्द बिना तो
एक वाक्य भी बोल नहीं पाते हैं।  

कविमन कैसे दिखाएँ तुम्हें
खिन्न सा भिन्न सा होता है,
झुंड की लम्बाई में भी 
स्वयं की गहनता में खोता है, 
मुस्कुराता हुआ वह मधुर चेहरा 
केवल एक मुखौटा है।  
एक व्याकुलता बनी रहती है - 
कहीं समय से पहले
अंगुलियाँ शिथिल न पड़ जाएँ, 
अकस्मात् एक सांझ 
विचारों की तीव्रता न ढल जाए, 
एक ललक सी सदा रहती है - 
संसार को भावप्रवणता से 
बेहतर बना जाएँ,
गिनेचुने भावुकों के लिए 
भावनाओं की धरोहर छोड़ जाएँ,
ताकि प्राण जाए पर काव्यवचन न जाए।

Published/Copyrighted: Published: https://sahityakunj.net/entries/view/kaavy-kyon

सन्दर्भ:
https://blog.practicalsanskrit.com/2010/04/wise-and-poet.html

सन्दर्भ 
https://blog.practicalsanskrit.com/2010/04/wise-and-poet.html 

Monday, March 7, 2022

चुप रहना


चुप रहना 
इस दिवाली है डाली 
एक अलग सी रंगोली, 
सारे शहर ने बनाई
हरी-नीली मोरनी, 
कर कान्हा किसली की कल्पना
मैंने बना डाली 
एक काली-पीली शेरनी। 
पर जब भरने बैठी 
जिह्वा में रंग गुलाल, 
काँपने लगे हाथ-पाँव 
मैं लज्जा से 
मेरी श्वेत कुर्ती लहू से हुई लाल लाल। 
माँ! क्या हुआ है मुझे 
क्यों हुआ यह हाल बेहाल? 
 
मत मचा इतना शोर 
थोड़ा धीमे-धीमे बोल, 
बस इतना समझ ले 
यह रक्त नहींं अमान्य पानी है
हर सयानी होती बालिका की 
यही अभिन्न मासिक कहानी है। 
मेरी रचनात्मक रानी! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरे छात्रजीवन का 
सबसे बड़ा इम्तिहान, 
सुना है केवल इस पर निर्भर 
आजीविका की बुनियाद, 
और आज ही है भयानक कमरदर्द
अंग अंग के ऐंठन का तूफ़ान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी प्रतियोगी परी! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरे खेलकाल की 
सबसे गंभीर होड़, 
मैं प्रदेश की प्रतिनिधि धावक
मेरा लक्ष्य दो सौ मीटर की दौड़, 
और आज ही है सख़्त सिरदर्द
चक्कर से घूमे सारा जहान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी तीव्र तितली! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरी प्रिय अनुजा 
की सगाई की साँझ, 
संगीत नृत्य से है भरनी 
मुझे ही इस उत्सव में जान, 
और आज ही हूँ मैं थक कर चूर 
बदन में सूजन चेहरा बेजान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी गुलगुली गुड़िया! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरे व्यवसाय का
सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण, 
एक भरी सभा के बीचों-बीच 
करना है दुष्कर शास्त्रार्थ कठिन प्रदर्शन, 
आज ही मेरे आवेगों की 
सारी हदें हुई हैं पार, 
मनोदशा कब बदले 
स्वयं ही नहींं कोई भान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी चिड़चिड़ी चिड़िया! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज हूँ मैं एक नयी नवेली माँ, 
नहींं जानती 
नींद प्यारी अधिक या यह नन्ही जान, 
रात दिन करना है 
जलपान स्तनपान गच्छे का स्नान, 
और आज ही मानो याद आ गयी
मेरी प्यारी नानीमाँ, 
जब प्रचण्डता में दुगुने हुए 
सारे लक्षणों के निशान, 
आ जो पसरा यह अनिश्चितकालीन मेहमान, 
प्रसव के पश्चात का प्रथम आतंकमय लहूलुहान। 
मेरी आदर्श आत्मजा! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 


[...continued from above] 
हाय! यह कैसा धर्म
क्या इतने धृष्ट थे 
मेरे पूर्वजन्म के कर्म? 
आरम्भ शर्मनाक अंत दर्दनाक
मन में वस्र-कलंक का भय
त्योहारों में पृथकता का भाव, 
जब मेरी पीड़ा से ही
चल रहा यह संसार, 
फिर क्यों है वर्जित 
पुरुषप्रधान समाज में 
इस विषय पर विमर्श-विचार? 
माँ! क्यों बोली तुम बारंबार? 
चुप रहना! किसी से कुछ न कहना! 
 
मेरी लड़ाकू लाड़ली! 
कितना कठिन है तेरे संग तर्क-कुतर्क
ग़लत समझी मुझे तू विगत सारे वर्ष, 
मैं बोली चुप रहना 
इसलिए नहींं कि है यह विषय निषेध, 
बल्कि इसलिए कि 
उस भिन्न लिंग में नहींं जड़ी है क्षमता 
जो तनिक भी समझे 
तेरे इस कष्ट की जटिलता का भेद। 

 
मेरी शौर्य शेरनी! 
आँखों में आँखें डाल
तू सारे कष्ट सह जाएगी 
पर “तुमसे इतना सा सहन नहीं होता“ 
यह वाक्य नहींं सह पायेगी, 
सुन इन बेदर्द शब्दों को
तेरी पीड़ा दुगुनी से तिगुनी हो जाएगी। 
इसलिए फिर दोहराती हूँ—
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना! 

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/chup-rahanaa 
महिला दिवस पर परुष को एक पुरजोश भेंट 
प्रतिमास असहनीय पीड़ा चुपचाप सहने वालियों को समर्पित 
सच्चे वृत्तांतों पर आधारित