Friday, May 20, 2022

भ्रमजननी

भ्रमजननी 

ऐ मेरे वंशधर! 
जिस क्षण बना था वह 
दो गुलाबी रेखाओं का रोचक समाचार, 
उस क्षण से बना है तू  
मेरी हर मंशा का राजकुमार।   

मेरा तेरा सम्बन्ध 
सरल सीधा स्पष्ट,
मैं तेरी 
पालिका
निर्णायिका परिवर्तक, 
 
तेरी विजय हेतु उत्सुक 
छवि हेतु अतिसजग।  

हर क्षण में भरे 
गतिविधियाँ आहार कार्यभार,

हर कण में भरे 
खिलौनें जुगत उपहार।   
तेरी शुद्धि हेतु लायी
प्रवचनों की बौछार, 
तेरे सिद्धि हेतु लगायी
नियमों की कतार।  

पर! उत्तर में मिल रहा
एक अनोखा बर्ताव
क्षण क्षण नए आवेश
नए टकराव नए बुलाव,
कभी असत्य कभी चोरी
कभी तिरस्कार तो
कभी बंद बोलचाल, 
निशिदिन सेवा
निरंतर निष्ठा
और हाथ आया  
मात्र एक लुप्त सरोकार! 

ऐ प्रदर्शक भ्रमजननी!
सर्वजानकार योजनाकार, 
आओ हम भी सुना डालें   
एक विलोम समाचार - 

तेरा यह सम्बन्ध
रैखिक नहीं पर है गोलाकार,
तू नहीं कोई पालिका
तेरा प्रतिपालक है यह नेत्तृत्वकार,
तू नहीं कोई निर्णायिका
स्वयं निर्णयात्मक है यह जन्मजात बुद्धिमान,
तू नहीं कोई परिवर्तक
अपितु तुझे ही मिला है
परिणत होने का 
एक निमंत्रण स्वर्णधार,
यदि कभी जान पाएगी यह भेद
शब्द नहीं जुटा पाएगी
प्रकट करने को आभार। 

न्योछावर किया था
वस्तुओं क्रियाओं का भण्डार, 
पर अपेक्षित था मात्र
भावुक समक्षता स्वीकृति का उपहार।  
झल्ला कर बोली थी 
तू क्रोध न कर, 
चिल्ला कर बोली थी 
तू मृदुता से बोला कर, 
व्यग्र हो बोली थी 
तू ध्यान धरा कर, 
जब मानहर नाम दिए थे 
करके अनंत अधिकार 
तब तेरे शब्दों से बना रहा था  
एक आतंरिक संसार, 
पहले विचारा न होगा 
अतिव्यस्तता अहं के कारण
पर आज सोच   
कहीं दे तो नहीं रही   
तू एक विसंगत उदाहरण। 

तेरी इस व्यथा का है ही नहीं
तेरे वंशधर से जुड़ा कोई तार,
वह हर उपद्रवी उत्प्रेरक बर्ताव 
असल में है- 
तेरे उपेक्षित भावों को
समक्ष लाते दर्पण के समान, 
कष्टों की जड़ों तक पहुँचाता
एक अग्रिम सोपान,
चैतन्य की ओर खींचता
एक निमंत्रण महान।

ऐ जननी! दे दे एक और जन्म 
कर स्वयं का पुनर्जन्म  
बन एक आध्यात्मिक संगिनी, 
प्रचलित अचेतावस्थाओं की भंगिनी,
चेतना से परिपूर्ण भागीरथी। 
तेरी मंशा को ललकारेंगे
जब कभी तेरे अंश के जीवन में 
वयस्कता के उत्कंठन
आर्थिक संकट 
संगियों के दबाव  
किसी निकटतम संबंध में 
आत्मीयता का अभाव, 
तब उस ही गंगा में गोता खा
पुनः स्वतः सशक्त होगा तेरा वह राजकुमार,
तब समझ लेना 
सफल हुई तेरी समक्षता 
सिद्ध हुआ तेरा यह सोनम सरोकार।

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/bhramjanani
सन्दर्भ: "The Conscious Parent: Transforming Ourselves, Empowering Our Children" by Shefali Tsabary 

धुरंधरों को तक नानी याद दिला देता है 

निःसंदेह इस युग का सबसे दुष्कर कार्य है - बच्चे की परवरिश 

डॉ. शेफ़ाली टसबरी (@doctorshefali) की किताब "The conscious parent" का सार बटोरती अंतर्राष्ट्रीय अभिभावक दिवस पर प्रस्तुत 
मेरी नयी रचना 

Tuesday, April 26, 2022

शुभ समाचार

शुभ समाचार


क्या बताऊँ अपनी व्यथा ऐ संसार
वर्षों से था इस क्षण का इंतज़ार, 
भावविभोरता की सारे हदें हुई पार
है ही कुछ ऐसा यह समाचार। 
मेरे मन से जिसका मन बन रहा 
दिखाने है उसे मन के सारे तार, 
मेरे हृदय से जिसका हृदय चल रहा
करनी हैं उससे सहृदयी बातें दो चार। 
  
“ॐ भूर्भुवः स्वः” 
जपकर दिया यह आमंत्रण 
शेष शब्दांश-ग्रंथियों का 
कर डाला फिर चीर हरण-
  
“तत्” से तापिनी से याद आया 
बहुत सीमित है मेरे सफलता के मापदंड, 
तुम प्रगति को एक नयी परिभाषा दिला जाना। 
“स” से सफला से याद आया 
हर विवाद पर लड़-झगड़ जाती हूँ मैं, 
तुम पराक्रम को दयालुता से संवेदना से ही दर्शाना। 
“वि” से विश्वा से याद आया 
छोटे परिवार के दायित्वों को ही समझ नहीं पायी हूँ मैं, 
तुम जगतकर्तव्यों को भी पूर्णतः निभा जाना। 
“तुर” से तुष्टि से याद आया 
जाने कितनों से कुढ़ कर बैठी हूँ मैं, 
तुम इन गाँठों को खोल मानव कल्याण कर जाना। 
“व” से वरदा से याद आया
अनंत अंशों में बिखरी हुई हूँ मैं, 
तुम पंचकोशों के योग से सदा एकत्रित रह जाना। 
“रे” से रेवती से याद आया 
प्रेम को अन्यत्र खोजकर स्वयं को खो चुकी हूँ मैं, 
तुम आत्ममूल्य जान पहले स्वयं की प्रेमिका बन जाना। 
“णि” से सूक्ष्मा से याद आया
धन को वस्तुओं से तोलती रही हूँ मैं, 
तुम दुर्लभ इंसानियत का धन अर्जित करती जाना। 
“यं” से ज्ञाना से याद आया 
अपने तेज को ख़ुद ही नहीं देख पायी हूँ मैं, 
तुम अपनी अन्तःचिंगारी से जगत प्रज्ज्वलित कर जाना। 
“भर” से भर्गा से याद आया 
अनजाने में परजीवियों को पनाह दी है मैंने, 
तुम सर्वप्रथम अन्तःज्योति की रक्षा कर जाना। 
“गो” से गोमती से याद आया 
बुद्धिमता को अंकों से आँकती रही हूँ मैं, 
तुम स्नेह और दया को ही बुद्धि के सर्वोत्तम रूप बना जाना। 
“दे” से देविका से याद आया
अवांछित वृत्तांतों से उभर नहीं पायी हूँ मैं, 
तुम दमन से दयालुता से धैर्य से स्वयं के घाव भर जाना। 
“व” से वराही से याद आया 
निष्ठा के भावार्थ को सहूलियत से बदल जाती हूँ मैं, 
तुम भक्ति की हर कसौटी पर खरी उतर जाना। 
“स्य” से सिंहनी से याद आया 
जनमान्यताओं को अपना समझ बैठी हूँ मैं, 
तुम टकसालों को अनसुना कर अद्वितीय धारणाएँ बना जाना। 
“धी” से ध्याना से याद आया 
अपनी ऊर्जा हर दिशा में फैला देती हूँ मैं, 
तुम अपने पवित्र प्राणों को पिशाचों से बचा जाना। 
“म” से मर्यादा से याद आया 
बिन बात प्रतिक्रिया दिखा देती हूँ मैं, 
तुम उत्तेजना और अनुक्रिया के मध्य रिक्तस्थान को धरण कर जाना। 
“हि” से स्फुटा से याद आया
अधजल मटकी सा शोर मचा जाती हूँ मैं, 
तुम शान्ति से हर तप-साधना की प्रतिध्वनि सुना जाना। 
“धि” से मेधा से याद आया
कल को भूल आज भूल कर जाती हूँ मैं, 
तुम दूरदर्शिता धरण कर जीवन ध्येय को हर पल चित्त पर बिठा जाना। 
“यो” से योगमाया से याद आया 
अध्यात्म की सतह भी नहीं खरोंच पायी हूँ मैं, 
तुम पूर्णतः जागृत हो प्रबुद्ध आत्मा बन जाना। 
“यो” से योगिनी से याद आया 
दिन के आधे काम अधूरे छोड़ जाती हूँ मैं, 
तुम पूर्ण सक्षमता से उत्पादन का उत्तम उदाहरण दिखा जाना। 
“नः” से धारिणी से याद आया 
जैसे को तैसा की होड़ में कड़वी हो चुकी हूँ मैं, 
तुम अंतर्मन की सरसता को हर दशा में बना रखना। 
“प्र” से प्रवभा से याद आया 
भेड़चाल चलते-चलते सिद्धांतों से विचलित हुई हूँ मैं, 
तुम आदर्शों पर अडिग नए रास्ते बना जाना। 
“चो” से ऊष्मा से याद आया 
छोटे मोटे रोड़ों पर आँसू बहा जाती हूँ मैं, 
तुम बड़ी बाधाओं को भी हँस कर हटा जाना। 
“द” से दृश्या से याद आया 
दूजों की बातों में आ घोर निर्णय ले जाती हूँ मैं, 
तुम अनगिनत मतों के बीचों-बीच अपना विवेक सँभाल रखना। 
“यात” से निरंजना से याद आया 
अपनी ही जटिलता में उलझी हुई हूँ मैं, 
तुम आत्मलीनता को त्याग सेवा को स्वभाव बना जाना। 
 
अहोभाग्य मेरे जो
तुमने चुना मुझे शुभ योग से, 
तुम भी जान लेना कि 
आई हो चयन से ना कि मात्र संयोग से। 
आज हर क्षुद्र मोच पर खरोंच पर, 
कस के थाम लेती हूँ माँ के पल्लू को, 
पर प्रसव के उन घंटों में मुँह से चू भी ना निकालूँगी, 
माँ गायत्री की सौगंध! 
बिन दर्दनिवारक बिन शल्यचिकित्सा तुम्हें इस संसार में लाऊँगी। 
जाने क्या किया अब तक रिश्तों का मैंने 
पर यह रिश्ता सम्पूर्ण समर्पण से निभाऊँगी। 
 
विनती है तुमसे
मेरी इन त्रुटियों को क्षमा कर जाना, 
इन स्वीकारोक्तियों के पश्चात भी
मेरे मातृत्व के निमंत्रण को स्वीकार कर जाना, 
माना अभी हो शून्य की दूरी पर
गुणों के परिमाणों में मुझसे कोसों दूर हो जाना, 
मुझ से निकल कर मुझ सी ना रह जाना, 
इस संक्षिप्त गर्भ संवाद को अंतस तक ग्रहण कर जाना 
और एक दिन मुझसे बहुत भिन्न बहुत बड़ी बन जाना। 

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/shubh-samachar

सन्दर्भ: 

मातृत्व के आरम्भ के मिश्रित भावों को समर्पित 
पुरातनकाल की गर्भ संवाद प्रथा से प्रेरित 
मेरी आधुनिक रचना "शुभ समाचार" 

Sunday, March 20, 2022

काव्य क्यों?

Published: https://sahityakunj.net/entries/view/kaavy-kyon 

आखिर लोग कविता लिखते ही क्यों है?

अंतर्राष्ट्रीय काव्य दिवस पर इस प्रश्न का उत्तर देती मेरी नयी रचना
"काव्य क्यों?"

काव्य क्यों?

एक बात कतई समझ ना आए
क्यों लिखती हो यह लंबी-चौड़ी
विचित्र विषयों वाली कविताएँ? 
लगता दूजा कोई काम न आए,
जो व्यस्त कर अंगुलियों को
बनाया यह अतरंगी व्यवसाय। 

एक बेरंग कागज़ 
दो-चार रंगो की स्याहियों का फुंवारा, 
चंद घंटो में होगा 
चंद शब्दों का तुकांत संवारा,
अंत में इठला कर लिखती हो 
दो अक्षर का नाम तुम्हारा,
मात्र इतना ही ना 
तुम्हारी  काव्य-कथा का किनारा? 

अवयः केवलकवयः कीरा स्युः केवलं धीराः।
वीराः पण्डितकवयस्तानवमन्ता तु केवलं गवयः॥

उफ़! इस ओर जो
यूँ अंगुली उठाई है, 
प्रतिवचन में हर अंगुली मेरी 
काव्य-उड़ान भरने को फड़फड़ायी है।  
क्या बताऊँ
अकथनीय काव्य की यह कथा है,
व्यवसाय नहीं 
यह तो एक विशिष्ट व्यथा है। 
मत पूछो कब लिखते हैं 
यह पूछो कब नहीं लिखते हैं।
आज बिक जाते हैं इंसान, 
बस कविमन से निकले
शब्द नहीं बिकते हैं।   

चंद मिनट पढ़ कर
सत्तानवों ने नकारा,
दो ने सरसरी आखों से सराहा, 
मात्र एक ने
दस बार पढ़ सम्मानजनक
 स्वीकारा।    
भावुकता यूँ लुप्त हुयी
कि गिनती के सरगर्म दिखते हैं,   
तो भूल कर भी ना समझना 
कि हम पाठकों को रिझाने के लिए लिखते हैं।  

तुम्हें दिखे जो 
सीमित शब्दकोष से निकले 
शब्दों की बूंदाबांदी,
है वह अनगिनत आयामों से निकले
मूसलाधार विचारों की आंधी
।   
तुम्हें लगे जो 
चतुर्रंगी स्याही की फुलवारी, 
है वह चेतन मन, अवचेतन मन,
हृदय और प्राण से निकली 
चतुर्धाम की सवारी।  

जब चेतन मन से निकलती 
इन्द्रियों की ग्रहणशक्ति की पुकार, 
कुछ शिकायत कुछ सुविचार 
कुछ सुधार कुछ आभार,
अति ऊहापोह से मुक्ति के लिए 
सौंप देते हैं किसी दैनंदिनी को 
रैन का चैन पाने के लिए।  

जब अवचेतन मन से निकलती
अंतःकरण के आघातों की कराह
कुछ गांठे कुछ कड़वाहट 
कुछ स्वीकारोक्तियाँ कुछ घबराहट, 
जिनकी औषधविज्ञान में कोई दवा नहीं होती,
सौंप देते हैं अंतरजाल के अंड को 
अन्तःशान्ति पाने के लिए।  

जब ह्रदय से निकलती
ह्रदयवासियों से संवाद की भाषा,
गुज़रो को अंतिम बिदाई देकर भी 
धरण करने की आशा, 
बिछड़ों को पूर्णतः खोकर भी 
पाने की अभिलाषा, 
जो कागज़ जला कर भी भस्म नहीं होती,  
सौंप देते हैं ब्रह्माण्ड के कम्पन को   
हृत्स्पंद निरंतर चलाने के लिए।   

जब प्राण से निकलती 
प्रभु से प्राणमयी प्रार्थनाएँ,
क्या त्यागें क्या अगले जन्म संग ले जाएँ,
प्रबुद्ध शुद्ध बनने का बोध आ जाए,  
जो नश्वर प्राणियों से व्यक्त न कर पाएँ,
सौंप देते हैं स्वर्ग के किसी अभ्र को 
प्राणपुण्य कमाने के लिए।  

[... continued from above] 

कविमन कैसे समझाएँ तुम्हें
कभी पश्मीना सा कोमल
कभी फ़ीते सा खिंचता है,  
शब्दों से इसका कुछ अलग ही रिश्ता है, 
कच्ची उम्र से ही 
हर मंजुल छंद पढ़ अंदर तक हिल जाते थे, 
हर पात्र की पृष्ठकथा सुन आंसू बहा जाते थे, 
प्रश्नों के उत्तर लिखते लिखते  
स्वरचित काव्य की छाप जमा जाते थे।  
सयाने हुए तो देखा 
असली संसार में है ही नहीं 
शब्दों का मोल भाषा का भाव,
बस सुनने पढ़ने में आता
एक लठ्ठमार प्रभाव,     
लोग प्रयोग के पूर्व 
शब्दों को तोल नहीं पाते हैं, 
और अपशब्द बिना तो
एक वाक्य भी बोल नहीं पाते हैं।  

कविमन कैसे दिखाएँ तुम्हें
खिन्न सा भिन्न सा होता है,
झुंड की लम्बाई में भी 
स्वयं की गहनता में खोता है, 
मुस्कुराता हुआ वह मधुर चेहरा 
केवल एक मुखौटा है।  
एक व्याकुलता बनी रहती है - 
कहीं समय से पहले
अंगुलियाँ शिथिल न पड़ जाएँ, 
अकस्मात् एक सांझ 
विचारों की तीव्रता न ढल जाए, 
एक ललक सी सदा रहती है - 
संसार को भावप्रवणता से 
बेहतर बना जाएँ,
गिनेचुने भावुकों के लिए 
भावनाओं की धरोहर छोड़ जाएँ,
ताकि प्राण जाए पर काव्यवचन न जाए।

Published/Copyrighted: Published: https://sahityakunj.net/entries/view/kaavy-kyon

सन्दर्भ:
https://blog.practicalsanskrit.com/2010/04/wise-and-poet.html

सन्दर्भ 
https://blog.practicalsanskrit.com/2010/04/wise-and-poet.html 

Monday, March 7, 2022

चुप रहना


चुप रहना 
इस दिवाली है डाली 
एक अलग सी रंगोली, 
सारे शहर ने बनाई
हरी-नीली मोरनी, 
कर कान्हा किसली की कल्पना
मैंने बना डाली 
एक काली-पीली शेरनी। 
पर जब भरने बैठी 
जिह्वा में रंग गुलाल, 
काँपने लगे हाथ-पाँव 
मैं लज्जा से 
मेरी श्वेत कुर्ती लहू से हुई लाल लाल। 
माँ! क्या हुआ है मुझे 
क्यों हुआ यह हाल बेहाल? 
 
मत मचा इतना शोर 
थोड़ा धीमे-धीमे बोल, 
बस इतना समझ ले 
यह रक्त नहींं अमान्य पानी है
हर सयानी होती बालिका की 
यही अभिन्न मासिक कहानी है। 
मेरी रचनात्मक रानी! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरे छात्रजीवन का 
सबसे बड़ा इम्तिहान, 
सुना है केवल इस पर निर्भर 
आजीविका की बुनियाद, 
और आज ही है भयानक कमरदर्द
अंग अंग के ऐंठन का तूफ़ान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी प्रतियोगी परी! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरे खेलकाल की 
सबसे गंभीर होड़, 
मैं प्रदेश की प्रतिनिधि धावक
मेरा लक्ष्य दो सौ मीटर की दौड़, 
और आज ही है सख़्त सिरदर्द
चक्कर से घूमे सारा जहान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी तीव्र तितली! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरी प्रिय अनुजा 
की सगाई की साँझ, 
संगीत नृत्य से है भरनी 
मुझे ही इस उत्सव में जान, 
और आज ही हूँ मैं थक कर चूर 
बदन में सूजन चेहरा बेजान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी गुलगुली गुड़िया! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरे व्यवसाय का
सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण, 
एक भरी सभा के बीचों-बीच 
करना है दुष्कर शास्त्रार्थ कठिन प्रदर्शन, 
आज ही मेरे आवेगों की 
सारी हदें हुई हैं पार, 
मनोदशा कब बदले 
स्वयं ही नहींं कोई भान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी चिड़चिड़ी चिड़िया! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज हूँ मैं एक नयी नवेली माँ, 
नहींं जानती 
नींद प्यारी अधिक या यह नन्ही जान, 
रात दिन करना है 
जलपान स्तनपान गच्छे का स्नान, 
और आज ही मानो याद आ गयी
मेरी प्यारी नानीमाँ, 
जब प्रचण्डता में दुगुने हुए 
सारे लक्षणों के निशान, 
आ जो पसरा यह अनिश्चितकालीन मेहमान, 
प्रसव के पश्चात का प्रथम आतंकमय लहूलुहान। 
मेरी आदर्श आत्मजा! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 


[...continued from above] 
हाय! यह कैसा धर्म
क्या इतने धृष्ट थे 
मेरे पूर्वजन्म के कर्म? 
आरम्भ शर्मनाक अंत दर्दनाक
मन में वस्र-कलंक का भय
त्योहारों में पृथकता का भाव, 
जब मेरी पीड़ा से ही
चल रहा यह संसार, 
फिर क्यों है वर्जित 
पुरुषप्रधान समाज में 
इस विषय पर विमर्श-विचार? 
माँ! क्यों बोली तुम बारंबार? 
चुप रहना! किसी से कुछ न कहना! 
 
मेरी लड़ाकू लाड़ली! 
कितना कठिन है तेरे संग तर्क-कुतर्क
ग़लत समझी मुझे तू विगत सारे वर्ष, 
मैं बोली चुप रहना 
इसलिए नहींं कि है यह विषय निषेध, 
बल्कि इसलिए कि 
उस भिन्न लिंग में नहींं जड़ी है क्षमता 
जो तनिक भी समझे 
तेरे इस कष्ट की जटिलता का भेद। 

 
मेरी शौर्य शेरनी! 
आँखों में आँखें डाल
तू सारे कष्ट सह जाएगी 
पर “तुमसे इतना सा सहन नहीं होता“ 
यह वाक्य नहींं सह पायेगी, 
सुन इन बेदर्द शब्दों को
तेरी पीड़ा दुगुनी से तिगुनी हो जाएगी। 
इसलिए फिर दोहराती हूँ—
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना! 

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/chup-rahanaa 
महिला दिवस पर परुष को एक पुरजोश भेंट 
प्रतिमास असहनीय पीड़ा चुपचाप सहने वालियों को समर्पित 
सच्चे वृत्तांतों पर आधारित 

Wednesday, November 24, 2021

Aapke Kandho Par

Published here https://www.kayasthasamaj.in/team/newsDetails/Aapke-Kandho-Par-923 

आपके कंधों पर 

बार बार एक स्वप्न आकर
धर जाता मेरी आँखों पर,
मैं छोटी सी गोल मटोल सी
श्वेत फ्रॉक पर श्वेत रूमाल लटकाकर,
रसना गर्ल से केश सजाकर, 
बड़े गर्व से अधिकार से 
बैठी हूँ आपके कंधों पर।
   
घूमूँ एक रंगीन सा मेला
जिस पर दृष्टि रुके
वह खेलयंत्र मेरा,
त्रिकोणी पतंगे प्रतिसम गुब्बारे 
बटोरे कितने चाँद सितारे 
गुल्लक भर भर कर,
बड़े गर्व से अधिकार से
बैठकर आपके कंधों पर। 

भोर हुयी तो थी मैं जैसे
एक नीरस श्वेतश्याम
चित्रपट के सेट पर,
ढीले खुदे पन्नो के धुआँरे
बिखरे उड़ते इधर उधर,    
सूना बेरंग ही रहा था सदा 
यह धुआँधारी नगर में 
बसा दादी का घर, 
मात्र स्वप्न ही था वह जहाँ 
बड़े गर्व से अधिकार से 
बैठी थी आपके कंधों पर।

संगमरमरी नगर 
से फिसल निकल मैं,
सुमोहित रंगीली दुनिया से,  
सुपोषित रसीले विषयों से, 
पुकारते यंत्र अधिगम, 
गले लगाती डेटा संरचना, 
पुचकारता संगणक विज्ञान,  
मीठी गोली खिलाते पाठ्य खनन, 
सिर-चढ़ाते खगोल भूगोल,    
पीठ थपथपाती त्रिकोणमिति ज्यामिति,   
आधी रात धैर्य से गोदी में सुलाते तकनीकी शोधकार्य,
धुल गया धुंधला गया
वह स्वप्न जहां 
बड़े गर्व से अधिकार से 
बैठी थी आपके कंधों पर।   

एकाएक आया
मध्यजीवन घोरसंकट, 
मोहभंग हुआ
सुन सुन कर रंगो का शोर,
शिथिल पड़ी
पी पी कर रसों का घोल,  
फिर सताने जगाने लगा 
वही स्वप्न जहां 
बड़े गर्व से अधिकार से 
बैठी थी आपके कंधों पर।

बैठ कंधों पर अब 
देख सकती थी सात समुन्दर पार, 
वह धुआँरे ढेर बन चुके थे 
क्रन्तिकारक काव्य संकलनों की कतार।  
पुकारने लगे "भोर के गीत" 
गले लगाने लगी "प्रभात फेरी"  
पुचकारने लगे "रजनी के पल"  
मीठी गोली खिलाने लगी "सुरबाला"
सिर-चढ़ाने लगे "सिर पर शोभित मुकुट हिमालय"     
पीठ थपथपाने लगे "आज़ादी के पहले आज़ादी के बाद" 
आधी रात धैर्य से गोदी में सुलाने लगे "विजन के फ़ूल"।

जड़ो में जकड़े काव्यरसों का
जबसे जलपान किया है,
शैशव के बारम्बार स्वप्न को
पूर्णतः भान लिया है,
उस श्वेतता में निहित इंद्रधनुष को 
अंततः पहचान लिया है।

हे स्वप्नसम्राट! हे कविराज! 
लो कवि बन ही गई मैं
गई मेरी भी अन्तःवाणी निखर,
गर्व से अधिकार से नहीं   
विनम्रता से कर्त्तव्य से,
बैठी नहीं खड़ी हूँ आज 
आपके स्वप्नमय महामय कंधों पर। 

सन्दर्भ: https://en.wikipedia.org/wiki/Indra_Bahadur_Khare 

Mere Sooraj Ka Tukda

Published here: https://sahityakunj.net/entries/view/mere-suraj-ka-tukda 

 मेरे सूरज का टुकड़ा 

हाँ नहीं देखा तुम्हे कभी 
बस देखी एक तस्वीर, 
एक सुनहरे चेहरे का गोलाकार
जिसमे निहित जैसे सौर परिवार।  

हेमंत की धूप सी भीनी मुस्कान
अरुणिमा से रंगे अधरो के कमान,
मध्यान्ह के सूर्य को भले ही ताक लूं लगातार,
इन चौंधियाने वाली चमचमाती आंखो में
नहीं झांक पाऊं एक भी बार, 
सुवर्ण कृष्ण सी छवि घुंघराले बाल लिए, 
किरणों सा वात्सल्य बिखेरती
दिवंगतों संगियों भावी आगंतुकों के लिए।  

इस रवि छवि पर नहीं हुआ
किसी अंजन का असर,
अपनों की सपनो की सूर्यदेवता की
लगनी ही थी नज़र। 
क्यों अस्त हुए यह बोध नहीं
कहाँ रूपांतरित हुए यह ज्ञात है मुझे, 
उस शून्यस्थान में गए थे छोड़  
एक लौ एक लपट,  
जो मैने उठा ली थी झट से झपट के,
जन्मदिन की भोर मिला
नया खिलौना समझ के। 

आज चार दशक पश्चात्
सवितुर की कृपा से 
उस लौ के उजाले में,
तुम दिवाकर से स्पष्ट दिखते हो मुझे
जनक की तपस्या नियमितता अनुशासन में
तेजस ऊर्जा आभा से मिलते उदाहरण में,
जननी के नर्म स्पर्श से मिलती राहत में
हाथ से बुने अनगिनत ऊनी कपड़ों की गरमाहट में,
भार्या की रक्षात्मकता सौहार्द में
अंधेरों से रावणों से अकेले डटकर निपटने की आग में।  

जानती हूं -
दिनकर की दूरी से अधिक दूर हो 
नही मिलोगे खेलने-लड़ने को
दो क्षण के लिए भी,
पास होते तो शायद लड़ लेते 
इस कृत्रिम सोने सी दुनिया से
थोड़ा मेरे लिए भी।   

पर जहां भी हो बस जान लेना -
मेरे अंतर्मन के आदित्य! 
उस लौ को रखती हूं सहेज कर
तुम्हारी सोनम धरोहर की तरह,
सदा रहते हो मेरे ही संग
मेरे रक्षाकवच मेरे सहोदर की तरह।