Sunday, March 20, 2022

काव्य क्यों?

Published: https://sahityakunj.net/entries/view/kaavy-kyon 

आखिर लोग कविता लिखते ही क्यों है?

अंतर्राष्ट्रीय काव्य दिवस पर इस प्रश्न का उत्तर देती मेरी नयी रचना
"काव्य क्यों?"

काव्य क्यों?

एक बात कतई समझ ना आए
क्यों लिखती हो यह लंबी-चौड़ी
विचित्र विषयों वाली कविताएँ? 
लगता दूजा कोई काम न आए,
जो व्यस्त कर अंगुलियों को
बनाया यह अतरंगी व्यवसाय। 

एक बेरंग कागज़ 
दो-चार रंगो की स्याहियों का फुंवारा, 
चंद घंटो में होगा 
चंद शब्दों का तुकांत संवारा,
अंत में इठला कर लिखती हो 
दो अक्षर का नाम तुम्हारा,
मात्र इतना ही ना 
तुम्हारी  काव्य-कथा का किनारा? 

अवयः केवलकवयः कीरा स्युः केवलं धीराः।
वीराः पण्डितकवयस्तानवमन्ता तु केवलं गवयः॥

उफ़! इस ओर जो
यूँ अंगुली उठाई है, 
प्रतिवचन में हर अंगुली मेरी 
काव्य-उड़ान भरने को फड़फड़ायी है।  
क्या बताऊँ
अकथनीय काव्य की यह कथा है,
व्यवसाय नहीं 
यह तो एक विशिष्ट व्यथा है। 
मत पूछो कब लिखते हैं 
यह पूछो कब नहीं लिखते हैं।
आज बिक जाते हैं इंसान, 
बस कविमन से निकले
शब्द नहीं बिकते हैं।   

चंद मिनट पढ़ कर
सत्तानवों ने नकारा,
दो ने सरसरी आखों से सराहा, 
मात्र एक ने
दस बार पढ़ सम्मानजनक
 स्वीकारा।    
भावुकता यूँ लुप्त हुयी
कि गिनती के सरगर्म दिखते हैं,   
तो भूल कर भी ना समझना 
कि हम पाठकों को रिझाने के लिए लिखते हैं।  

तुम्हें दिखे जो 
सीमित शब्दकोष से निकले 
शब्दों की बूंदाबांदी,
है वह अनगिनत आयामों से निकले
मूसलाधार विचारों की आंधी
।   
तुम्हें लगे जो 
चतुर्रंगी स्याही की फुलवारी, 
है वह चेतन मन, अवचेतन मन,
हृदय और प्राण से निकली 
चतुर्धाम की सवारी।  

जब चेतन मन से निकलती 
इन्द्रियों की ग्रहणशक्ति की पुकार, 
कुछ शिकायत कुछ सुविचार 
कुछ सुधार कुछ आभार,
अति ऊहापोह से मुक्ति के लिए 
सौंप देते हैं किसी दैनंदिनी को 
रैन का चैन पाने के लिए।  

जब अवचेतन मन से निकलती
अंतःकरण के आघातों की कराह
कुछ गांठे कुछ कड़वाहट 
कुछ स्वीकारोक्तियाँ कुछ घबराहट, 
जिनकी औषधविज्ञान में कोई दवा नहीं होती,
सौंप देते हैं अंतरजाल के अंड को 
अन्तःशान्ति पाने के लिए।  

जब ह्रदय से निकलती
ह्रदयवासियों से संवाद की भाषा,
गुज़रो को अंतिम बिदाई देकर भी 
धरण करने की आशा, 
बिछड़ों को पूर्णतः खोकर भी 
पाने की अभिलाषा, 
जो कागज़ जला कर भी भस्म नहीं होती,  
सौंप देते हैं ब्रह्माण्ड के कम्पन को   
हृत्स्पंद निरंतर चलाने के लिए।   

जब प्राण से निकलती 
प्रभु से प्राणमयी प्रार्थनाएँ,
क्या त्यागें क्या अगले जन्म संग ले जाएँ,
प्रबुद्ध शुद्ध बनने का बोध आ जाए,  
जो नश्वर प्राणियों से व्यक्त न कर पाएँ,
सौंप देते हैं स्वर्ग के किसी अभ्र को 
प्राणपुण्य कमाने के लिए।  

[... continued from above] 

कविमन कैसे समझाएँ तुम्हें
कभी पश्मीना सा कोमल
कभी फ़ीते सा खिंचता है,  
शब्दों से इसका कुछ अलग ही रिश्ता है, 
कच्ची उम्र से ही 
हर मंजुल छंद पढ़ अंदर तक हिल जाते थे, 
हर पात्र की पृष्ठकथा सुन आंसू बहा जाते थे, 
प्रश्नों के उत्तर लिखते लिखते  
स्वरचित काव्य की छाप जमा जाते थे।  
सयाने हुए तो देखा 
असली संसार में है ही नहीं 
शब्दों का मोल भाषा का भाव,
बस सुनने पढ़ने में आता
एक लठ्ठमार प्रभाव,     
लोग प्रयोग के पूर्व 
शब्दों को तोल नहीं पाते हैं, 
और अपशब्द बिना तो
एक वाक्य भी बोल नहीं पाते हैं।  

कविमन कैसे दिखाएँ तुम्हें
खिन्न सा भिन्न सा होता है,
झुंड की लम्बाई में भी 
स्वयं की गहनता में खोता है, 
मुस्कुराता हुआ वह मधुर चेहरा 
केवल एक मुखौटा है।  
एक व्याकुलता बनी रहती है - 
कहीं समय से पहले
अंगुलियाँ शिथिल न पड़ जाएँ, 
अकस्मात् एक सांझ 
विचारों की तीव्रता न ढल जाए, 
एक ललक सी सदा रहती है - 
संसार को भावप्रवणता से 
बेहतर बना जाएँ,
गिनेचुने भावुकों के लिए 
भावनाओं की धरोहर छोड़ जाएँ,
ताकि प्राण जाए पर काव्यवचन न जाए।

Published/Copyrighted: Published: https://sahityakunj.net/entries/view/kaavy-kyon

सन्दर्भ:
https://blog.practicalsanskrit.com/2010/04/wise-and-poet.html

सन्दर्भ 
https://blog.practicalsanskrit.com/2010/04/wise-and-poet.html 

Monday, March 7, 2022

चुप रहना


चुप रहना 
इस दिवाली है डाली 
एक अलग सी रंगोली, 
सारे शहर ने बनाई
हरी-नीली मोरनी, 
कर कान्हा किसली की कल्पना
मैंने बना डाली 
एक काली-पीली शेरनी। 
पर जब भरने बैठी 
जिह्वा में रंग गुलाल, 
काँपने लगे हाथ-पाँव 
मैं लज्जा से 
मेरी श्वेत कुर्ती लहू से हुई लाल लाल। 
माँ! क्या हुआ है मुझे 
क्यों हुआ यह हाल बेहाल? 
 
मत मचा इतना शोर 
थोड़ा धीमे-धीमे बोल, 
बस इतना समझ ले 
यह रक्त नहींं अमान्य पानी है
हर सयानी होती बालिका की 
यही अभिन्न मासिक कहानी है। 
मेरी रचनात्मक रानी! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरे छात्रजीवन का 
सबसे बड़ा इम्तिहान, 
सुना है केवल इस पर निर्भर 
आजीविका की बुनियाद, 
और आज ही है भयानक कमरदर्द
अंग अंग के ऐंठन का तूफ़ान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी प्रतियोगी परी! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरे खेलकाल की 
सबसे गंभीर होड़, 
मैं प्रदेश की प्रतिनिधि धावक
मेरा लक्ष्य दो सौ मीटर की दौड़, 
और आज ही है सख़्त सिरदर्द
चक्कर से घूमे सारा जहान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी तीव्र तितली! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरी प्रिय अनुजा 
की सगाई की साँझ, 
संगीत नृत्य से है भरनी 
मुझे ही इस उत्सव में जान, 
और आज ही हूँ मैं थक कर चूर 
बदन में सूजन चेहरा बेजान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी गुलगुली गुड़िया! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज है मेरे व्यवसाय का
सबसे महत्त्वपूर्ण क्षण, 
एक भरी सभा के बीचों-बीच 
करना है दुष्कर शास्त्रार्थ कठिन प्रदर्शन, 
आज ही मेरे आवेगों की 
सारी हदें हुई हैं पार, 
मनोदशा कब बदले 
स्वयं ही नहींं कोई भान, 
आ जो पसरा यह आकस्मिक मेहमान। 
मेरी चिड़चिड़ी चिड़िया! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 

 
आज हूँ मैं एक नयी नवेली माँ, 
नहींं जानती 
नींद प्यारी अधिक या यह नन्ही जान, 
रात दिन करना है 
जलपान स्तनपान गच्छे का स्नान, 
और आज ही मानो याद आ गयी
मेरी प्यारी नानीमाँ, 
जब प्रचण्डता में दुगुने हुए 
सारे लक्षणों के निशान, 
आ जो पसरा यह अनिश्चितकालीन मेहमान, 
प्रसव के पश्चात का प्रथम आतंकमय लहूलुहान। 
मेरी आदर्श आत्मजा! 
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना। 


[...continued from above] 
हाय! यह कैसा धर्म
क्या इतने धृष्ट थे 
मेरे पूर्वजन्म के कर्म? 
आरम्भ शर्मनाक अंत दर्दनाक
मन में वस्र-कलंक का भय
त्योहारों में पृथकता का भाव, 
जब मेरी पीड़ा से ही
चल रहा यह संसार, 
फिर क्यों है वर्जित 
पुरुषप्रधान समाज में 
इस विषय पर विमर्श-विचार? 
माँ! क्यों बोली तुम बारंबार? 
चुप रहना! किसी से कुछ न कहना! 
 
मेरी लड़ाकू लाड़ली! 
कितना कठिन है तेरे संग तर्क-कुतर्क
ग़लत समझी मुझे तू विगत सारे वर्ष, 
मैं बोली चुप रहना 
इसलिए नहींं कि है यह विषय निषेध, 
बल्कि इसलिए कि 
उस भिन्न लिंग में नहींं जड़ी है क्षमता 
जो तनिक भी समझे 
तेरे इस कष्ट की जटिलता का भेद। 

 
मेरी शौर्य शेरनी! 
आँखों में आँखें डाल
तू सारे कष्ट सह जाएगी 
पर “तुमसे इतना सा सहन नहीं होता“ 
यह वाक्य नहींं सह पायेगी, 
सुन इन बेदर्द शब्दों को
तेरी पीड़ा दुगुनी से तिगुनी हो जाएगी। 
इसलिए फिर दोहराती हूँ—
तू सब सुघड़ता से सहना
मगर चुप रहना, किसी से कुछ न कहना! 

Published/Copyrighted: https://sahityakunj.net/entries/view/chup-rahanaa 
महिला दिवस पर परुष को एक पुरजोश भेंट 
प्रतिमास असहनीय पीड़ा चुपचाप सहने वालियों को समर्पित 
सच्चे वृत्तांतों पर आधारित 

Wednesday, November 24, 2021

Aapke Kandho Par

Published here https://www.kayasthasamaj.in/team/newsDetails/Aapke-Kandho-Par-923 

आपके कंधों पर 

बार बार एक स्वप्न आकर
धर जाता मेरी आँखों पर,
मैं छोटी सी गोल मटोल सी
श्वेत फ्रॉक पर श्वेत रूमाल लटकाकर,
रसना गर्ल से केश सजाकर, 
बड़े गर्व से अधिकार से 
बैठी हूँ आपके कंधों पर।
   
घूमूँ एक रंगीन सा मेला
जिस पर दृष्टि रुके
वह खेलयंत्र मेरा,
त्रिकोणी पतंगे प्रतिसम गुब्बारे 
बटोरे कितने चाँद सितारे 
गुल्लक भर भर कर,
बड़े गर्व से अधिकार से
बैठकर आपके कंधों पर। 

भोर हुयी तो थी मैं जैसे
एक नीरस श्वेतश्याम
चित्रपट के सेट पर,
ढीले खुदे पन्नो के धुआँरे
बिखरे उड़ते इधर उधर,    
सूना बेरंग ही रहा था सदा 
यह धुआँधारी नगर में 
बसा दादी का घर, 
मात्र स्वप्न ही था वह जहाँ 
बड़े गर्व से अधिकार से 
बैठी थी आपके कंधों पर।

संगमरमरी नगर 
से फिसल निकल मैं,
सुमोहित रंगीली दुनिया से,  
सुपोषित रसीले विषयों से, 
पुकारते यंत्र अधिगम, 
गले लगाती डेटा संरचना, 
पुचकारता संगणक विज्ञान,  
मीठी गोली खिलाते पाठ्य खनन, 
सिर-चढ़ाते खगोल भूगोल,    
पीठ थपथपाती त्रिकोणमिति ज्यामिति,   
आधी रात धैर्य से गोदी में सुलाते तकनीकी शोधकार्य,
धुल गया धुंधला गया
वह स्वप्न जहां 
बड़े गर्व से अधिकार से 
बैठी थी आपके कंधों पर।   

एकाएक आया
मध्यजीवन घोरसंकट, 
मोहभंग हुआ
सुन सुन कर रंगो का शोर,
शिथिल पड़ी
पी पी कर रसों का घोल,  
फिर सताने जगाने लगा 
वही स्वप्न जहां 
बड़े गर्व से अधिकार से 
बैठी थी आपके कंधों पर।

बैठ कंधों पर अब 
देख सकती थी सात समुन्दर पार, 
वह धुआँरे ढेर बन चुके थे 
क्रन्तिकारक काव्य संकलनों की कतार।  
पुकारने लगे "भोर के गीत" 
गले लगाने लगी "प्रभात फेरी"  
पुचकारने लगे "रजनी के पल"  
मीठी गोली खिलाने लगी "सुरबाला"
सिर-चढ़ाने लगे "सिर पर शोभित मुकुट हिमालय"     
पीठ थपथपाने लगे "आज़ादी के पहले आज़ादी के बाद" 
आधी रात धैर्य से गोदी में सुलाने लगे "विजन के फ़ूल"।

जड़ो में जकड़े काव्यरसों का
जबसे जलपान किया है,
शैशव के बारम्बार स्वप्न को
पूर्णतः भान लिया है,
उस श्वेतता में निहित इंद्रधनुष को 
अंततः पहचान लिया है।

हे स्वप्नसम्राट! हे कविराज! 
लो कवि बन ही गई मैं
गई मेरी भी अन्तःवाणी निखर,
गर्व से अधिकार से नहीं   
विनम्रता से कर्त्तव्य से,
बैठी नहीं खड़ी हूँ आज 
आपके स्वप्नमय महामय कंधों पर। 

सन्दर्भ: https://en.wikipedia.org/wiki/Indra_Bahadur_Khare 

Mere Sooraj Ka Tukda

Published here: https://sahityakunj.net/entries/view/mere-suraj-ka-tukda 

 मेरे सूरज का टुकड़ा 

हाँ नहीं देखा तुम्हे कभी 
बस देखी एक तस्वीर, 
एक सुनहरे चेहरे का गोलाकार
जिसमे निहित जैसे सौर परिवार।  

हेमंत की धूप सी भीनी मुस्कान
अरुणिमा से रंगे अधरो के कमान,
मध्यान्ह के सूर्य को भले ही ताक लूं लगातार,
इन चौंधियाने वाली चमचमाती आंखो में
नहीं झांक पाऊं एक भी बार, 
सुवर्ण कृष्ण सी छवि घुंघराले बाल लिए, 
किरणों सा वात्सल्य बिखेरती
दिवंगतों संगियों भावी आगंतुकों के लिए।  

इस रवि छवि पर नहीं हुआ
किसी अंजन का असर,
अपनों की सपनो की सूर्यदेवता की
लगनी ही थी नज़र। 
क्यों अस्त हुए यह बोध नहीं
कहाँ रूपांतरित हुए यह ज्ञात है मुझे, 
उस शून्यस्थान में गए थे छोड़  
एक लौ एक लपट,  
जो मैने उठा ली थी झट से झपट के,
जन्मदिन की भोर मिला
नया खिलौना समझ के। 

आज चार दशक पश्चात्
सवितुर की कृपा से 
उस लौ के उजाले में,
तुम दिवाकर से स्पष्ट दिखते हो मुझे
जनक की तपस्या नियमितता अनुशासन में
तेजस ऊर्जा आभा से मिलते उदाहरण में,
जननी के नर्म स्पर्श से मिलती राहत में
हाथ से बुने अनगिनत ऊनी कपड़ों की गरमाहट में,
भार्या की रक्षात्मकता सौहार्द में
अंधेरों से रावणों से अकेले डटकर निपटने की आग में।  

जानती हूं -
दिनकर की दूरी से अधिक दूर हो 
नही मिलोगे खेलने-लड़ने को
दो क्षण के लिए भी,
पास होते तो शायद लड़ लेते 
इस कृत्रिम सोने सी दुनिया से
थोड़ा मेरे लिए भी।   

पर जहां भी हो बस जान लेना -
मेरे अंतर्मन के आदित्य! 
उस लौ को रखती हूं सहेज कर
तुम्हारी सोनम धरोहर की तरह,
सदा रहते हो मेरे ही संग
मेरे रक्षाकवच मेरे सहोदर की तरह।   

Friday, October 22, 2021

Mera Kuch Saamaan


मेरा कुछ सामान 


नमस्कार!
आइये बैठिये!
आपका बहुत बहुत स्वागत है
मेरे दस कक्षों के घर में,
अनगिनत खुशियां डाली
हर खिड़की हर दर में।
इतनी माया ममता बुद्धिमता बरसाई
हर नुक्कड़ कोने वास्तु में,
कि जीवन मिले ना मिले अन्य किसी ग्रह पर,
अवश्य मिल जाएगा मेरे गृह की प्रत्येक वस्तु में।  

शुरू करती हूँ प्रवेश मार्ग 
हरे भरे आँगन बगीचे से,
"हर्ष" से सींचे मैंने इतने गमले 
कभी ऊपर कभी नीचे से, 
आमोद बिछाया बाघ बैठक के फर्नीचर बंदनवार में,
उल्लास पिरोया हर रंग के पवन झंकार में। (१)

इतने देशों से लायी
इस बैठक कक्ष का सामान,
तब जाकर बना यहाँ का "अभिमान"।  
हर दीवार पर भर-भर के चिपका दी
संसार की सबसे सुन्दर तस्वीरें,
गर्वान्वित करते मुझे यह गद्देदार सोफे,
सौ इंच का टीवी और प्रदर्शन कृतियों की लकीरें। (२)

और यह है चांदी के छुरी-कांटो
से "मनोरंजित" भोजन कक्ष,
भर-भर के परोसा आतिथ्य
दस कुर्सियों की भोजन मेज़ पर,
और उसपर चिपकायी चंदेरी चटाई इस कदर
होने नही देती तनिक भी इधर उधर। (३)  

पीढ़ियो से इतने "प्यार" से संभाले
जाने कितने अचार मिर्च मसाले,
हर परिमाण के बर्तन डिब्बे जुटाए 
जमाये खानों में कस कस के,
रसोई पर न्योछावर किए
जाने कितने प्याले प्रेम रस के। (४)   

और यह है घर के अंदर ही दफ्तर, 
डाली यहाँ बेहिसाब "प्रेरणा" 
हर उपकरण का सर्वश्रेष्ठ रूपांतर, 
चार चित्रपटों वाला नवीनतम संगणक 
एकाधिक वैशिष्टयों वाला अधुनातम मुद्रक,
और ऊंचा सा तख्ता धरे
एक सौ से अधिक पुस्तक। (५) 

सोने वाले दो, पर तकिये हैं बीस, 
चारो ओर परदों की परत तीस,
भूमि पर सुप्त कालीन आलीशान,
प्रकट तो करती हूँ प्रतिदिन "आभार" 
पर लौटा ना पाऊँगी इस शयन कक्ष के एहसान । (६)

किस परिधान पर क्या जंचता है,
किसे कौनसा अलंकार अच्छा लगता है, 
कौन चाहता इस्त्री सिलाई, 
किसे हैंगर तो किसे ड्रावर भायी, 
सारी "दिलचस्पी" सारी संवेदना लुटा देती हूँ
इस वस्त्र कक्ष में धीरज धर के घंटो बिता देती हूँ।(७)

और यहाँ हज़ारो की तादाद मे भरे
खिलौनों से मेरी लाखों "आशाएं",
एक प्रतिशत भी संदेह ना आए -
खेल का परिश्रावक चिकित्सक बना देगा
गृहों का नमूना वैज्ञानिक बना देगा
पिंग-पांग का संग्रह सीधे ओलिंपिक पंहुचा देगा।(८)

पावचक्की साइकिल डंबेल से तना, 
योग चटाई इलाजी वृक्षों पत्थरो से सना,
"श्रद्धा" का पात्र व्यायाम कक्ष,
आधुनिक पुरातन का उत्तम मिश्रण,
भले ही महीनो होते नहीं दर्शन,
फिर भी मेरी सारी आस्थाएं है यहाँ अर्पण।(९)

अंततः यह है मेरा अतिपवित्र पूजा कक्ष,
ध्यान जप से भर दी है परम "शान्ति",
एक विस्तृत सा मंदिर अनेकों प्रतिमाएं,
बगल में बड़ी सी अलमारी में सधी 
पूजा की पुस्तकें यज्ञ सामग्री वृत कथाएं।(१०)

नमस्कार!
कोने में चुप बैठा
एक लाचार उपेक्षित वंचित इंसान,
सामान को मिलता इतना सम्मान
देख कर है बड़ा हैरान परेशान,
मन ही मन सोच रहा कि काश! 

वहाँ सुख बरसाते बरसाते,
यहाँ एक आंसू ही सुखा दिया होता। (१)
वहाँ गौरव करते करते,
यहाँ एक गुण ही स्वीकार लिया होता। (२)
वहाँ मनोरंजन करते करते,
यहाँ देख बस एक बार मुस्कुरा दिया होता। (३) 
वहाँ प्रेम रस बहाते बहाते,
यहाँ स्नेह का एक घूँट ही पिला दिया होता। (४)
वहाँ प्रेरणा जगाते जगाते,
यहाँ कल की किरण देखने का एक कारण ही दिखा दिया होता। (५)
वहाँ आभार प्रकट करते करते,
यहाँ वर्षो की सेवा को एक क्षण ही सराह दिया होता। (६)
वहाँ दिलचस्पी दिखाते दिखाते,
यहाँ दिल का नहीं तो दिन का हाल ही जान लिया होता। (७)
वहाँ आस लगाते लगाते, 
यहाँ एक प्रतिशत विश्वास ही जता दिया होता।(८)
वहाँ आस्था भरते भरते,
यहाँ एक ईमान ही भान लिया होता। (९)
वहाँ शांतिकुंज बनाते बनाते,
यहाँ मन के कोलाहल को बस हल्के से सहला दिया होता। (१०)

चीज़ो के दाम
ब्रांडो के नाम जानते जानते
इंसान की कीमत को भुला दिया है।
अति की हद करते करते 
धरती को स्पर्धा का आलय बना दिया है।
भौतिकवाद में खोते खोते 
घर को मंदिर की जगह संग्रहालय बना दिया है।

देख निर्जीवो के प्रति
इंसान का यह शाश्वत समर्पण, 
लगता पृथ्वीग्रह पर हो
जैसे एक सर्वव्यापी भ्रम -
जब आएगा यमराज का निमंत्रण,
चार कन्धों संग चलेंगे
सामान से आबाद चार बड़े बड़े वाहन।

सन्दर्भ: डॉ. बारबरा फ्रेड्रिक्सन की किताब "पॉसिटिविटी" में विस्तारित सकारात्मकता के दस पहलुओं पे आधारित https://counselorcarmella.wordpress.com/2012/07/31/dr-fredricksons-10-positive-emotions/)

Copyrighted/Published: Published here https://sahityakunj.net/entries/view/mera-kuchh-saman 

पृष्ठभूमि: संसार में हास्यास्पद गति से बढ़ते हुए भौतिकवाद से प्रेरित "Black Friday" पर विशेष मेरी नयी रचना 


Monday, September 20, 2021

Tum Se Na Ho Payega (hindi)

Published here. http://sahityakunj.net/entries/view/tum-se-naa-ho-payega 

तुम से ना हो पायेगा 


नवरसों से भर भर के, 
जब भेजेंगे हम मतों के तीर,
तो कौन तुम्हे बचाएगा ?
कोशिश भी ना करना प्यारी,
दसों दिशाओं से बोले हम पीर, 
कि तुमसे ना हो पायेगा !

यह जो अव्वल आयी हो आज 
बस रट्टा मारी मारी, 
अनर्थ सारे अंक, 
कल बस करनी है तैयार
रोटी भाजी तरकारी । (१) 

बनाएं है यह जो छप्पन पकवान, 
और सजाएं है कला शिल्प के चित्रहार, 
जो हमपे होता समय अपार 
हम भी पालते रुचियाँ हज़ार । (२) 

इतनी सादी सात्विक कि 
गाय समझ यह दुनिया चर जाएगी, 
इतनी बनी ठनी बनावटी कि 
अत्यधिक श्रृंगार देख यह दुनिया डर जाएगी । (३) 

इतनी मधुभाषी कि कैसे बनोगी  
कोई चिकित्सक प्राध्यापिका या प्रबंधक, 
इतना उच्च स्वर कि सब कहें
अशिष्ट कठिन भयानक । (४) 

विदेशी हो तो होंगे नखरे हज़ार 
देसी हो तो होगी गऊ गंवार, 
इतनी हल्की कि हवा में उड़ जाएगी  
इतनी भारी कि धरा ही फट जाएगी  ।  (५) 

बन जाओ अब प्रेमिका हमारी 
लगती हूबहू विश्वसुंदरी, 
वरना खो बैठोगी रंग रूप 
यूँ करेंगे चरित्र हनन हर गली बिरादरी । (६) 

लेलो चाहे कोई उपाधि 
करलो उच्चतम से उच्चतर शिक्षा पूरी, 
जब तक ना जाओगी बियाही और फलोगी दो पूत 
रहोगी मात्र अधूरी की अधूरी । (७)

अरे तुम कैसे बनी पटरानी
कैसे मिली है यह सत्ता ? 
निश्चित होगी पहुंच पिता या पति की 
या मिला होगा नियति  का कोई तुरूप पत्ता  । (८) 

दिखती हो बड़ी संतुष्ट सी आज 
अच्छी नहीं लगती यूं आनंद में रम, 
चलो याद दिलाएं कोई दुर्बलता कोई दुखद क्षण 
एक नयी तरह से करें यह शान्ति भंग । (९) 
 

प्रथमं शैलपुत्री  द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेतिचतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति.महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री  नवदुर्गाप्रकीर्तिता:
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।

हँसते हुए झेले थे, 
रस लेके भेजे गए 
वह व्यंग विष के तीर,
रूढ़ियों की टकसाल दोहरा रहे 
आप पीर हो या हो कोई कीर?
अपने मंद मतों को दर्शाने के लिए, 
आपका बहुत बहुत आभार।
व्यस्त थे इतने स्वयं के विकास में 
कि पहले ना किया कोई प्रतिवाद कोई वार ।
यूँ तो हम रखते नहीं 
विषैले तत्वों से कोई सरोकार, 
नवरात्रि  के इस पावन अवसर पर 
सोचा हम भी दिखा दें अपना धर्म ईमान, 
उठा लें अपनी कलम का कमान
और लगा दें एक तीर से नौ निशान  ।

इन अंको से आंकने वालो को 
दो क्षण में ही हर लेते हैं ,
जब मस्तक पे सजे अर्धचंद्रकार से 
लकीरों के बीच भी पढ़ लेते हैं । (१) 

ना रुचियाँ ना अभिरुचियाँ, 
हैं बस कुछ माताकृपाएं,
मिली कुछ इस भांति  
यह दसों दिशाओं में फैली दशभुजाएँ, 
कि समय से पराजित कभी हो ही ना पाए  । (२) 

जिन्हे कभी खटकती सादगी 
तो कभी वस्त्र अलंकार, 
आओ पढ़ा दें उन्हें सौंदर्यशास्त्र का पहला पाठ, 
सादगी की सशक्ति सिद्ध हुयी 
जब निरंतर फिराए मोती एक सौ आठ, 
और श्रृंगार रसे केवल स्वयं के लिए 
उम्र सोलह हो या साठ । (३) 

नहीं आती रंगीन भाषा इनसी 
नहीं सीखी नपी तुली सी बोली सतही, 
बस रखते एक कलश में मधु तो दूजे में लहू, 
सीधे विचारों से होता संचार 
और सन्देश होते शुद्ध सहृदयी । (४) 

हमारा श्वेत-श्याम में विभाजन करके 
इन्हें परमानन्द मिला है।
है इनकी समझ से कोसों दूर कि 
यह गहन कमल कीचड़ में नहीं 
नरक से होकर खिला है । (५) 

लगता जिन्हे कि मान प्रतिष्ठा 
बनते-बिगड़ते लगते एक दो दिन, 
दिखते इन्हें हम मात्र 
एक शिकार एक कमसिन, 
पर माँ ! मत घबराना तुम, 
बेटी नहीं, जन्मी है एक बाघिन ।  (६) 

सुन कर प्रगति की 
यह सीमित परिभाषा
है स्तंभित मेरे मानसबाण, 
हम हैं ऐसा बीज 
जो चूक से भी दब जाए 
तो जन जाए सम्पूर्ण ब्रम्हांड । (७) 

आज के रावण को जलाने 
नहीं चाहिए कोई वानर सेना 
ना कोई रामभक्त मदारी, 
बस चाहिए एक अदृश्य त्रिशूल से 
अदृश्य आड़ तोड़ती, 
कर्मठ स्वाधीन सी नारी । (८) 

हर घाव पर गौरव हमें
हर भूल से मिली सीख है याद,
यह शान्तिचक्र अर्जित हुआ
घोर नवचक्र साधन के ही बाद। 
इन पुनर्निर्मित कर्णों के बगल 
अब सदा रखते एक शंख,
जो बोले जामवंत सा नाद ।  (९) 

Thursday, August 5, 2021

Pita aur Panchtatv (Hindi)

Published https://www.kayasthasamaj.in/team/newsDetails/details-766 

ना हास ना परिहास 
ना किसी उत्सव में आस 
जाने कैसे बीते 
विगत बारह मास  

 पिता और पंचतत्व 

आज का दिन है अद्भुत सा,
कुछ जीवित कुछ मृत सा,
प्राण का हर मूल तत्व लगे
कुछ विष कुछ अमृत सा,
जलता बुझता सा दिखा
जब घनी छांव सा वह हाथ,
जीवन की लाख स्मृतियां
ज्वलंत हो गई एक साथ


सातवें आसमाँ की नीलिमा में बसा 
मेरा स्वर्ग से सुन्दर बचपन,
गगनचुंबी इमारत सा लगता
अनंत छूट का वह बिन खूंट आँगन,


आज भी आँगन में उड़ती दिखे वह 
गोदी से उछलती हुई हवा की सवारी,
मिले थे अनगिनत इंद्रधनुषी पंख
और मैं थी हवामहल की राजकुमारी


पंख से अधिक मिली थी जड़ें
वह भूमि पे रहने का सादापन,
आज भी सत्कारे वह काठ का गुड़िया घर
और उसमे सजे माटी के बर्तन, 


बर्तन से याद आये वह घाट घाट के जलपान
बिन पतवार की थीं कितनी नदियाँ पार,  
मानो संग था कोई सेतु 
बांधे कितने गांव कितने परिवार 


उस सेतु में ज्वलित छोटे शहर की बड़ी तपस्या, 
बिटिया को आगे पढ़ाने की,
देती रही मुझे एक आँच एक अग्नि 
सीमाओं से बड़े स्वप्न सजाने की  


आज का दिन है अद्भुत सा
है पिता का अंतिम संस्कार,
इन अर्चित पुष्पों में दिखे
वह बिन मांगे मिले मनचाहे उपहार,
इस तिलक के आरोह से स्मृत होता
वह मेरे हर गुण का गुणा कर जाना,
इस वस्र की श्वेतता से सुधता 
वह मेरी हर भूल को क्षण में क्षमा कर जाना, 
इन चरणों में बंधी सुतली में दिखी
वह संक्रांति की पतंग की डोरी,
राम नाम सत्य है की गूँज में 
फिर सुनाई दी वह बचपन की लोरी


आज पिता के साथ 
भस्म हुआ वह निःशर्त लाड़,
ध्वस्त हुई वह बेटी 
राख हुआ वह असीम दुलार,  
क्षण भर में हुई
राजकुमारी से भिक्षिका 
कर रही अंतिम बिदाई
वह कल्पना से कठिन कपाल क्रिया 
सौंप रही उन्हीं  पंचतत्वों को,
अंततः सीख रही पुत्री धरम
कोई आँच न आये यही याचना
मिले चरम मोक्ष शांति परम